बहाव
बहाव पोस्ट संख्या -81 तुम लिखते हो या कलम के साथ बहते हो पानी सा बहाव संग रखते हो! किसी लौकिक जगत की कल्पना में हो या किसी दैवीय शक्ति की कल्पना करते हो! जो तुम हाड़-माँस के पुतले में भी एक अप्रतिम देवी के दर्शन करते हो!! अजीब है तुम्हारी दृष्टि और अवलोकन का ढंग कैसे तुम इतनी गहनता में जाकर भीतर का मन पढ़ लेते हो और सामने आए बिना ही तुम चुपचाप निहारते हो!! तुम्हारी गलती भी एक सच्ची सी भूल लगती है!! तुम्हारे हृदय में भरा हुआ असीम स्नेह लगती है फूलों के साथ शूलों की चुभन भी मीठी लगती है!! कितनी सादगी से प्रशंसा कर दी तुमने जिसकी भी वह इस संसार में लाजवाब लगती है! पूर्णिमा!वह तुम्हारे सपनों का एक हसीन ख्वाब लगती है! डॉ.पूर्णिमा राय, पंजाब