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मेरी तन्हाई-- वापिसी (भाग-30)डॉ.पूर्णिमा राय, पंजाब

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मेरी तन्हाई-- वापिसी (भाग-30) डॉ.पूर्णिमा राय, पंजाब अवकाश के दिनों का पता ही नहीं चलता कि कब खत्म हो जाते हैं ।और कभी-कभी ऐसा लगता है कि अवकाश आता ही क्यों है ?समय बीते ही नहीं बिताया जाता है।  इस बार गर्मियों की छुट्टियां जब आई तो पता ही नहीं चला कि कैसे वक्त बीत गया और अब लग रहा है कि क्या आज अंतिम अवकाश का दिन है! सोच रही हूँ कि अवकाश का आनंद सिर्फ अपने मन पर निर्भर करता है। अपनी दिनचर्या से अलग जब हमें अवकाश मिलता है तो हमें काफी अच्छा महसूस होता है। अवकाश और दिनचर्या में फर्क बस इतना होता है कि हम दैनिक कार्यों से अलग होकर वह कार्य करते हैं जो हमारी दिनचर्या का हिस्सा नहीं होता ।इसलिए हमें अवकाश का आनंद अधिक आता है।इस बार की छुट्टियों में एक भी पल ऐसा नहीं गुजरा जिसमें अपने लिए समय अर्थात खाली समय मिला हो। शिक्षा विभाग की ओर से मेरीटोरियस स्कूल में समर कैंप का आयोजन हुआ। छात्रों को नव तकनीक से शिक्षित किया गया।साथी ऐप पर छात्रों की ऑनलाइन कक्षाओं का कार्य चला। जनगणना संबंधी कार्य ,एस आई आर ,ड्रगस एंवं सोशल इकोनामिक्स जनगणना में अधिकारियों के ड्यूटी चली। ब्राइट मा...

मेरी तन्हाई-- समय (भाग-29)डॉ.पूर्णिमा राय,पंजाब

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मेरी तन्हाई-- समय (भाग-29) डॉ.पूर्णिमा राय,पंजाब हे ईश्वर !हमारे साथ ही ऐसा क्यों होता है? हमने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है? हम पर ही मुसीबत के पहाड़ क्यों टूट पड़ते हैं? बार-बार तुम हमारे ही घर पर गमों को दस्तक देने के लिए भेज देते हो ?आखिर ऐसा क्यों होता है? हम भी तो तेरे ही बनाए हुए इंसान है? हमारी भी रगों में  अन्य लोगों जैसा ही खून है ?हमने ऐसे कौन से पाप किए हैं ,जिनकी सजा तुम हमें दे रहे हो! एक मुसीबत खत्म नहीं होती ,दूसरी मुसीबत आ जाती है। इन सवालों के कटघरे में हम अपने मन के साथ-साथ अपने भगवान को भी जिस पर हमें विश्वास है, उस ईश्वर को भी कटघरे में खड़ा कर देते हैं। सवालों की जड़ी लगा देते हैं। पर हम शांत मन से सहजावस्था में चाहकर भी उस मुसीबत के दौर से  गुजर नहीं पाते हैं। वह समय बिताये नहीं बीतता है ।हर पल दु:खद एहसास होता रहता है ।यह सब हमारी मानसिक अवस्था एवं भावनात्मक स्तर पर निर्भर करता है ।जब हम दुनिया में इधर-उधर झांकते हैं,अपने स्व: के दुख से इतर इधर-उधर देखते हैं तो हमें आए दिन कोई ना कोई ऐसी दुर्घटना नजर आ जाती है, जिसके साथ साधारणीकरण होने पर हमे...

मेरी तन्हाई--ख्वाहिश (भाग-28)डॉ.पूर्णिमा राय, पंजाब

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मेरी तन्हाई--ख्वाहिश (भाग-28) डॉ.पूर्णिमा राय, पंजाब  गम की राहों पर चलना ज़रा होशियारी से, खुशियों के फूल खिलते हैं सिर्फ मेहनत से!! जब हम कोई उम्मीद नहीं रखते हैं तो कभी-कभी कुछ ऐसा होता है कि हमारे भीतर स्वत: ही और अधिक ऊर्जा का संचार होना आरंभ हो जाता है। आप सबके जीवन में आए दिन कोई ना कोई खुशी या गमी आती रहती होगी, क्योंकि यह जिंदगी है ।मैंने शायद पहले भी कहीं जिक्र किया होगा कि कोई भी कार्य जो हमने कभी ना किया हो जब हम पहली बार करते हैं तो उसका अनुभव कुछ अलग ही होता है।ऐसे ही मैंने जीवन में कसरत /व्यायाम/योगाभ्यास को कभी महत्व नहीं दिया। पर जब महत्व देने लगी तो अपने भीतर एक सुकून का अनुभव होने लगा। सहजावस्था आने लगी।अपने लिए तो हम अपने पैसे खर्च करके कुछ ना कुछ खरीदते ही रहते हैं या हम दूसरों के लिए भी कई बार कुछ खरीद कर दे देते हैं। कहते हैं जो मन में ठान लो वह आपको मिल जाएगा ।पर कुछ लोग जब कहते हैं कि हमने सोचा था, हमें वह मंजिल नहीं मिली ।तब मन का विचलित होना आवश्यक है।बात चाहे आपको छोटी लगी पर मुझे आपको बताते हुए अच्छा महसूस हो रहा है। मैंनें फरवरी में फ्री ऑ...

मेरी तन्हाई- जिंदगी (भाग-27)डॉ.पूर्णिमा राय, पंजाब

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मेरी तन्हाई- जिंदगी (भाग-27) डॉ.पूर्णिमा राय, पंजाब जिंदगी बहुत ही अजीब है ।एक पल में गम के बादल आ जाते हैं तो दूसरे पल में सुख की घटाएं भी दिखाई देनी शुरू हो जाती हैं‌। लोग कहते हैं कि बादल छा गए हैं ,काली घटाएं आ रही है  पर बादलों के बीच में से चमकती हुई बिजली की तरह सफेद रंग की लकीरें हैं ,वह भी जिंदगी जीने की उम्मीद जगा देती हैं।बस ऐसा ही कुछ आजकल मेरे साथ चल रहा है ।कभी खुशियाँ इतनी आ रही है कि समेट नहीं पा रही और कभी आंँखों से बरसात होने लगती है।कभी दिल पिघल कर मोम जैसा बन जाता है । तो कभी चट्टान जैसा पत्थर दिल हो जाता है।कभी सोचती हूँ कि जिंदगी इम्तिहान ले रही है, परीक्षाएं ले रही है ,क्या मैं उन परीक्षाओं में पास हो पाऊँगी ?बस इसी उधेड़बुन में जिंदगी बीत रही है। छोटी-छोटी खुशियों को बटोरती हुई जिंदगी आगे बढ़ती चली जा रही है ।आज ब्राइट माइंड पंजाब -2026 का प्रोग्राम गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी अमृतसर में दशमेश ऑडिटोरियम में हुआ ।जिसमें शिक्षा मंत्री श्री हरजोत सिंह बैंस जी ,मनीष सिसोदिया जी, डायरेक्टर पंजाब स्कूल शिक्षा विभाग सकत्तर  सिंह बल जी एवं अन्य उच्च ...

मेरी तन्हाई--गहरी नींद (भाग-26)डॉ.पूर्णिमा राय, पंजाब

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मेरी तन्हाई--गहरी नींद (भाग-26) डॉ.पूर्णिमा राय, पंजाब रात को गहरी नींद में सोने से पहले सुबह की योजना के बारे में जानने की इच्छा लिए हुए अचेत मन सो जाता है ।सुबह की योजना से बेखबर मन यही सोचता है कि अब शायद कुछ नहीं हो सकता ।अब कल जो होगा देखा जाएगा। बस यही सोचकर हमारा मन रात को गहन निद्रा में सो जाता है। एक समय था ।जब हम लोग खत लिखते थे, तार भेजते थे तो दो-तीन दिन बाद वह खत मिलता था ।कई बार वह काफी-काफी दिनों बाद मिलता था और हमें सूचना मिलती थी। हमें फिर पता चलता था कि कोई प्रोग्राम होने जा रहा है। आजकल ऑनलाइन का जमाना है। व्हाट्सएप का जमाना आ गया है तो व्हाट्सएप के माध्यम से हमें योजनाओं को बनाने और उन्हें लागू करने में बिल्कुल भी ज्यादा समय नहीं लगता है और सूचना शीघ्र ही भेज दी जाती है। ऐसे ही रात को गहन निद्रा में सोई हुई मैं यह सोचती रही कि कल का कोई प्रोग्राम शायद नहीं होगा। बस इतना सा पता है कि एक मीटिंग होनी है तो मीटिंग का कोई स्थान पता न होने की वजह से बेचैन मन गहन निद्रा में सो जाता है ।आप समझ सकते हैं जब इंसान सो जाता है तो फिर भूल जाता है कि सुबह जो होगा देखा...

मेरी तन्हाई: संकेत भाषा (भाग-25)डॉ.पूर्णिमा राय, पंजाब

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मेरी तन्हाई: संकेत भाषा (भाग-25) डॉ.पूर्णिमा राय, पंजाब दोस्तो! हमारी भारतीय परंपरा एवं सांस्कृतिक विरासत बहुत विशाल एवं संपन्न है ।भारतीय परंपराओं को जीवित रखने के लिए हमें बार-बार इन चीजों को दोहराने की आवश्यकता नहीं होती। भारतीय विरासत जिंदा रहे, यही दुआएं रहती हैं।उसके लिए हमें जैसे-जैसे समय बीत रहा है वैसे-वैसे हमें भावी पीढ़ी को उसके प्रति सचेत और जागरूक करने की आवश्यकता होती है। हमारे पूर्वजों ने तथा बड़े-बुजुर्गों ने जो देखा है ,उनके जो अनुभव है वह एक तरह की भारतीय विरासत और परंपरा ही है ।अगर हम अपने बड़े-बुजुर्गों के बताए हुए रास्तों को अपनाकर ही आज जीवनयापन करते हैं तो आज के समय में इस वातावरण के अनुसार जीवन जीना मुश्किल हो जाता है। इसके लिए आवश्यक है कि हमें अपने बुजुर्गों के बताए हुए अनुभवों को एवं अपनी विरासत को साथ लेकर चलना होगा। पारंपरिक जीवन को वर्तमान के साथ तालमेल बिठाकर जिंदगी जीना आवश्यक है। यह तभी हो सकता है जब हमारे भीतर सुनने की क्षमता हो, हमारे भीतर ठहराव हो, हम अपने भीतर से मैं-मेरी की भावना को समाप्त कर पाएं, तभी हम आगे आज के समय में सुखी और खुशह...

मेरी तन्हाई -हाल-चाल(भाग-24)डॉ.पूर्णिमा राय, पंजाब

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मेरी तन्हाई -हाल-चाल(भाग-24) डॉ.पूर्णिमा राय, पंजाब जब हम किसी को एक अरसे बाद मिलते हैं तो हमारा पहला प्रश्न होता है --आप कैसे हैं ?तो आगे से उनका जवाब यही आता है कि हम ठीक हैं !फिर वह हमारे परिवार का हाल-चाल पूछते हैं! बच्चों के बारे में पूछते हैं! आसपास के माहौल के बारे में बातें होती है! अगर कोई व्यक्ति जिसे हम मिलते हैं ,वह बीमार है तो हम उसको अपनी ही तरह से नए--नए ढंग तरीके बताने लग जाते हैं कि वह ठीक हो जाए। क्या ऐसा सोचना हमारा सही होता है? बीमार व्यक्ति तो अपनी बीमारी के बारे में बताता है। उसके मन का बोझ हल्का होता है, पर हम उसकी बीमारी के नए-नए ढंग बता कर क्या हम उसके बोझ को हल्का कर रहे होते हैं ?या उसको दबाव में लाकर अपनी बातें लागू करवा रहे होते हैं। हम कभी ऐसा नहीं सोचते। यह भी सोचने का प्रश्न है कि क्या किसी एक बीमारी का इलाज जब हम अपने तरीके से किसी को बताते हैं तो क्या जो फायदा हमें हुआ है या हमने किसी को फायदा होते सुना है, जिसको हम बता रहे हैं क्या उस व्यक्ति को भी उस बात का फायदा होता है। क्या ऐसा हमने महसूस किया है या सिर्फ हम अपनी बात ही कहना चाहते है...