मौसम-ए-वक्त़
मौसम-ए-वक्त़ महकती हुई फूलों की डालियों से महकने का हुनर बाकी है सीखना! एक ही डाली पर उगे हैं सुर्ख गुलाबी फूल , साथ में दिख रहे हैं थोड़े हल्के रंग के भी !! हर तना,हर पत्ता, हर डाली जगा रहें हैं नव आस व विश्वास , मौसम-ए-वक्त़ को सह रहे हैं सूर्य के साथ खिल रहे हैं!! अहसास करवा रहें हैं जीवन का, सभी न होते हैं हमेशा एक समान! उन्नीस-बीस का फ़र्क दिख जाता है चाहे फिर भी जीने की कला रहती है आबाद!! कमतर न समझना कभी स्वयं को, हर ज़र्रा ,हर शख़्स समेटे हुए है कुदरत को फ़िक्र न करना गर कोई बदल ले फितरत को!! डॉ.पूर्णिमा राय, पंजाब। 30/9/26