मेरी तन्हाई---संवेदना (भाग-12)डॉ.पूर्णिमा राय, पंजाब
मेरी तन्हाई---संवेदना (भाग-12) डॉ.पूर्णिमा राय, पंजाब कूकर की सीटी बज रही है! जी हां,ठीक सुना आपने! पर यह कूकर की सीटी मेरे घर पर नहीं, आस-पड़ोस के किसी घर से आवाज़ आ रही है। दोपहर का समय है तो कुछ ना कुछ तो किसी के घर में पक रहा होगा ।शायद खिचड़ी ,खुद में हँसती हूँ। खिचड़ी का नाम इसलिए लेती हूँ क्योंकि आज मेरे पेट में हल्का-हल्का दर्द हो रहा है और जिससे मुझे कुछ भी खाने का मन नहीं हो रहा और यही लग रहा है कि कोई भी कुछ पका रहा है तो शायद खिचड़ी ही बना रहा होगा। फिर मेरी कल्पना दूसरी ओर अंगड़ाई लेती है -शायद चने, शायद राजमां या शायद कुछ...और--- और यह शायद ही है जो हमारे मन में हमेशा बना रहता है ।इतने में गली में आवाज़ आती है आलू ले लो, सब्जी ले लो, बैंगन ले लो, समझ नहीं आता ।कभी-कभी उसकी आवाज़ में इतना आक्रोश सुनाई देता है और कभी-कभी सब्जी वाले की आवाज में मिठास सुनाई देती है। कभी वह इतनी भाग-दौड़ में होता है कि आवाज़ ही नहीं सुन पाती और वह गली के दूसरे छोर पर पहुँच जाता है और हम लोग बिना सब्जी लिए ही रह जाते हैं। कई बार ऐसा महसूस होता है कि वह शायद गली में सिर्फ फेरी लगाने...