पत्थर दिल नहीं,दर्द छिपाता रहा
पत्थर दिल नहीं,दर्द छिपाता रहा ! गमों को सहने की जद्दोजहद में उसने गम को ही जिंदगी मान लिया ! औ' हरेक गम को हंस कर सहना सीख लिया।!! ना शिकवा है, ना शिकायत है किसी से, खुद की तकलीफों से यारी निभा ली, यारों को बनाकर राज़दार अपना थोड़ी सी ठोकर भी खा ली!! हंसते रहे ,हंसाते रहे आँख के अश्क भी छुपाते रहे! तकिये के भीगे कोरों की नमी को , रात की आगोश में महसूस करते रहे!! सभी के साथ हर हाल में, खड़ा था जो पत्थर की तरह, उसके पिघलते हुए दिल को कोई कभी समझ ना सका! जलते हुए दीये की रोशनी भी, वक्त से मद्दिम हो जाए, तेरी दोस्ती के किस्से सुनते रहें सदा याद बनके "पूर्णिमा", तू सदा आबाद रहे!! डॉ.पूर्णिमा राय, पंजाब 24/10/26