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आकलन( लघुकथा)

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          आकलन( लघुकथा) कुछ पल के लिए आँखें मूंदे हुए स्निग्धा शांत मन से बैठी हुई थी। अपने मन में उठते हुए सवालों एवं जिम्मेदारियों का आकलन कर रही थी। अचानक फोन की घंटी बजती है। हेलो मैडम, मैं श्रेया बोल रही हूँ। क्या आप मुझे समझा देंगे कि यह कार्य कैसे करना है। श्रेया का यह सवाल सुनते ही स्निग्धा उत्तेजित होकर कहती है कि कितनी बार आपको समझाया है। बार-बार वही बातें दोहराई जा रही हैं। आपको जल्दी समझ क्यों नहीं आता है? मुझे तो लगता है कि आप लोग समझना ही नहीं चाहते हैं। स्निग्धा भूल जाती है कि उसका स्वर थोड़ा कर्कश हो गया।कर्कश ध्वनि में सारी बातें सुनकर श्रेया की आँखें भर आती हैं और वह फोन पर ही फूट-फूट कर रोने लगती है। इधर स्निग्धा रोने की आवाज सुनकर थोड़ा घबरा जाती है। स्वयं को दोषी मानती है। अहसास करती है कि उसे धैर्य रखना चाहिए था। ऐसे नहीं बोलना चाहिए था।अभी स्निग्धा सोच ही रही थी कि श्रेया आगे से कहती है कि मैडम सबकी सामर्थ्य व योग्यता एक जैसी नहीं होती है।बार-बार समझाने के बावजूद भी चाह कर भी हम समझ नहीं पा रहे हैं । क्या कार्य हमें पहले करना है और क्या...

मौसम-ए-वक्त़

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मौसम-ए-वक्त़ महकती हुई फूलों की डालियों से महकने का हुनर बाकी है सीखना! एक ही डाली पर उगे हैं सुर्ख गुलाबी फूल , साथ में दिख रहे हैं थोड़े हल्के रंग के भी !! हर तना,हर पत्ता, हर डाली जगा रहें हैं नव आस व विश्वास , मौसम-ए-वक्त़ को सह रहे हैं सूर्य के साथ खिल रहे हैं!! अहसास करवा रहें हैं जीवन का, सभी न होते हैं हमेशा एक समान! उन्नीस-बीस का फ़र्क दिख जाता है चाहे फिर भी जीने की कला रहती है आबाद!! कमतर न समझना कभी स्वयं को, हर ज़र्रा ,हर शख़्स समेटे हुए है कुदरत को फ़िक्र न करना गर कोई बदल ले फितरत को!! डॉ.पूर्णिमा राय, पंजाब। 30/9/26

Teacher's Day Celebration💐

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  Teacher's Day Celebration💐 SOE FOR GIRLS MALL ROAD ,AMRITSAR ਅੱਜ ਮਿਤੀ 5 ਸਤੰਬਰ ਨੂੰ ਸਕੂਲ ਆਫ਼ ਐਮੀਨੈਂਸ ਫਾਰ ਗਰਲ਼ਜ ਮਾਲ ਰੋਡ ਵਿਖੇ ਪ੍ਰਿੰਸੀਪਲ ਮੈਡਮ ਸ਼੍ਰੀਮਤੀ ਮਨਦੀਪ ਕੌਰ ਜੀ ਦੀ ਰਹਿਨੁਮਾਈ ਹੇਠ ਅਧਿਆਪਕ ਦਿਵਸ ਬਹੁਤ ਹੀ ਸ਼ਾਨਦਾਰ ਅਤੇ ਸੁਚੱਜੇ ਢੰਗ ਨਾਲ ਮਨਾਇਆ ਗਿਆ। ਅਧਿਆਪਕ ਦਿਵਸ ਦਾ ਸੁਚਾਰੂ ਪ੍ਰਬੰਧ ਅਤੇ ਸੰਚਾਲਨ ਲੈਕਚਰਾਰ ਮੈਡਮ ਆਦਰਸ਼, ਲੈਕਚਰਾਰ ਮਨਦੀਪ ਕੌਰ,ਮੈਡਮ ਰਮਨ ਕਾਲਿਆ, ਹਿਸਾਬ ਅਧਿਆਪਿਕਾ ਮੈਡਮ ਇਤੀ ਸ਼ਰਮਾ ਅਤੇ ਕੰਪਿਊਟਰ ਅਧਿਆਪਿਕਾ ਮੈਡਮ ਈਸ਼ਾ ਵੱਲੋਂ ਬਾਖੂਬੀ ਕੀਤਾ ਗਿਆ। ਇਸ ਮੌਕੇ ਪ੍ਰਿੰਸੀਪਲ ਮੈਡਮ ਵੱਲੋਂ ਸਟੇਟ ਅਵਾਰਡ ਲਈ ਨਾਮਜ਼ਦ ਲੈਕਚਰਾਰ ਕਮਲ ਅਰੋੜਾ ਅਤੇ ਕੰਪਿਊਟਰ ਫੈਕਲਟੀ ਪਰਮ ਆਫ਼ਤਾਬ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਸਟੇਟ ਅਵਾਰਡ ਦੇ ਹੱਕਦਾਰ ਦੱਸਦਿਆਂ ਹੋਇਆਂ ਵਿਸ਼ੇਸ਼ ਤੌਰ ਤੇ ਸ਼ੀਲਡ ਦੇ ਕੇ ਸਨਮਾਨਿਤ ਕੀਤਾ ਗਿਆ। ਸਕੂਲ ਦੇ ਪ੍ਰਿੰਸੀਪਲ ਵੱਲੋਂ ਸਕੂਲ ਦੇ ਸਮੂਹ ਸਟਾਫ ਨੂੰ ਸਕੂਲ ਵਿੱਚ ਨਿਭਾਈਆਆਂ ਸ਼ਲਾਘਾਯੋਗ ਸੇਵਾਵਾਂ ਸਦਕਾ ਸਰਟੀਫਿਕੇਟ ਦੇ ਕੇ ਹੌਂਸਲਾ ਅਫਜ਼ਾਈ ਕੀਤੀ ਗਈ। ਮੈਡਮ ਆਦਰਸ਼ ਵੱਲੋਂ ਸਮੂਹ ਸਟਾਫ ਨੂੰ ਸਨਮਾਨ ਚਿੰਨ ਵਜੋਂ ਬੈਚ ਭੇਂਟ ਕੀਤਾ ਗਿਆ। ਮੈਡਮ ਇਤੀ ਸ਼ਰਮਾ ਵੱਲੋਂ ਅਧਿਆਪਕਾਂ ਦੀ ਸ਼ਮੂਲੀਅਤ ਕਰਵਾਉਂਦੇ ਹੋਏ ਵੱਖ ਵੱਖ ਪ੍ਰੇਰਨਾਦਾਇਕ ਅਤੇ ਮਨੋਰੰਜਕ ਭਰਪੂਰ ਛੋਟੀਆਂ-ਛੋਟੀਆਂ ਅਧਿਆਪਕਾਂ ਦੀਆਂ ਗਤੀਵਿਧੀਆਂ ਕਰਵਾ ਕੇ ਪ੍ਰੋਗਰਾਮ ਵਿੱਚ ਰੰਗ ਬੰਨ੍ਹਿਆ ਗਿਆ। ਵਿਦਿਆਰਥੀਆਂ ਨੇ ਵੀ ਆਪਣੇ ਅਧਿਆਪਕਾਂ...

आपबीती ---खुदा के बंदे ने जब सुझाई राह ,हो गई नव जगमगाहट

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  आपबीती ---खुदा के बंदे ने जब सुझाई राह ,हो गई नव जगमगाहट----------(डॉ.पूर्णिमा राय, पंजाब) रात (31अगस्त )को निश्चिंत होकर सो गई कि अब सुबह आराम से ऊठूँगी और अपने सितंबर महीने के कार्य का आगाज करूँगी ।ब्लॉक रिसोर्स कोऑर्डिनेटर होने के नाते हमें अपने विजिट करने वाले स्कूलों की सूचना पहले फार्म में भरनी होती है ।आज मैंने एक दिन पहले ही वह सूचना भर दी और रात को सो गई। सोये हुए अचानक मुझे एकदम से गोल-गोल सिर घूमने जैसा महसूस हुआ । यह चक्कर बहुत ही खतरनाक था।उस वक्त मेरे मन से यही आवाज आई कि हे भगवान मुझे कुछ नहीं होगा! मैंनें इसी अवस्था में दोनों हाथों की मुट्ठियों को भींच लिया और अपने आप को समझाया कि मुझे कुछ नहीं होगा ।पर चक्कर रुक-रुक आते ही जा रहे थे। मैंनें उठने का प्रयास किया, पर उठ नहीं पाई। फिर मैंनें दायीं करवट बदलनी चाही तो भी मेरा सिर बहुत तेज घूमा। मैंनें फिर बाईं तरफ कोशिश की तो भी मेरा सिर बहुत तेजी से घूमने लगा।इस समय मैं बहुत घबरा भी रही थी और डर भी रही थी ।यही मन में आ रहा था कि कहीं मुझे कुछ हो ना जाये। इसी बीच मेरे हाथ भी सुन्न होने लग गए थे ।थोड़ी देर बाद मैंनें ...

दोहे_पूर्णिमा :रोजगार की खोज में

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  दोहे_पूर्णिमा :रोजगार की खोज में दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगी, लोगों की यह भीड़! रोजगार की खोज में,लगी टूटने रीढ़!!१ जनसँख्या दर रोकनी, कुछ तो करो उपाय! शिक्षित हों उल्लास से,बढ़ जायें व्यवसाय!!२ जागृत हों वोटर सभी ,मत निर्णय हकदार! आत्मसजगता भाव ही,प्रगति का आधार!!३ भूख-गरीबी मार से ,लोग हैं परेशान! वोट के बदले नोट से,कहाँ मिले सम्मान!!४ दर-दर भटके जिंदगी,भूत भविष्य वर्तमान! कहे 'पूर्णिमा' विश्व से ,श्रम करना आसान!!५                डॉ.पूर्णिमा राय,  शिक्षिका एवं लेखिका ,पंजाब 11जुलाई ,2026

मेरी तन्हाई-- वापसी (भाग-30)डॉ.पूर्णिमा राय, पंजाब

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मेरी तन्हाई-- वापसी (भाग-30) डॉ.पूर्णिमा राय, पंजाब अवकाश के दिनों का पता ही नहीं चलता कि कब खत्म हो जाते हैं ।और कभी-कभी ऐसा लगता है कि अवकाश आता ही क्यों है ?समय बीते ही नहीं बिताया जाता है।  इस बार गर्मियों की छुट्टियां जब आई तो पता ही नहीं चला कि कैसे वक्त बीत गया और अब लग रहा है कि क्या आज अंतिम अवकाश का दिन है! सोच रही हूँ कि अवकाश का आनंद सिर्फ अपने मन पर निर्भर करता है। अपनी दिनचर्या से अलग जब हमें अवकाश मिलता है तो हमें काफी अच्छा महसूस होता है। अवकाश और दिनचर्या में फर्क बस इतना होता है कि हम दैनिक कार्यों से अलग होकर वह कार्य करते हैं जो हमारी दिनचर्या का हिस्सा नहीं होता ।इसलिए हमें अवकाश का आनंद अधिक आता है।इस बार की छुट्टियों में एक भी पल ऐसा नहीं गुजरा जिसमें अपने लिए समय अर्थात खाली समय मिला हो। शिक्षा विभाग की ओर से मेरीटोरियस स्कूल में समर कैंप का आयोजन हुआ। छात्रों को नव तकनीक से शिक्षित किया गया।साथी ऐप पर छात्रों की ऑनलाइन कक्षाओं का कार्य चला। जनगणना संबंधी कार्य ,एस आई आर ,ड्रगस एंवं सोशल इकोनामिक्स जनगणना में अधिकारियों के ड्यूटी चली। ब्राइट माइ...

मेरी तन्हाई-- समय (भाग-29)डॉ.पूर्णिमा राय,पंजाब

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मेरी तन्हाई-- समय (भाग-29) डॉ.पूर्णिमा राय,पंजाब हे ईश्वर !हमारे साथ ही ऐसा क्यों होता है? हमने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है? हम पर ही मुसीबत के पहाड़ क्यों टूट पड़ते हैं? बार-बार तुम हमारे ही घर पर गमों को दस्तक देने के लिए भेज देते हो ?आखिर ऐसा क्यों होता है? हम भी तो तेरे ही बनाए हुए इंसान है? हमारी भी रगों में  अन्य लोगों जैसा ही खून है ?हमने ऐसे कौन से पाप किए हैं ,जिनकी सजा तुम हमें दे रहे हो! एक मुसीबत खत्म नहीं होती ,दूसरी मुसीबत आ जाती है। इन सवालों के कटघरे में हम अपने मन के साथ-साथ अपने भगवान को भी जिस पर हमें विश्वास है, उस ईश्वर को भी कटघरे में खड़ा कर देते हैं। सवालों की जड़ी लगा देते हैं। पर हम शांत मन से सहजावस्था में चाहकर भी उस मुसीबत के दौर से  गुजर नहीं पाते हैं। वह समय बिताये नहीं बीतता है ।हर पल दु:खद एहसास होता रहता है ।यह सब हमारी मानसिक अवस्था एवं भावनात्मक स्तर पर निर्भर करता है ।जब हम दुनिया में इधर-उधर झांकते हैं,अपने स्व: के दुख से इतर इधर-उधर देखते हैं तो हमें आए दिन कोई ना कोई ऐसी दुर्घटना नजर आ जाती है, जिसके साथ साधारणीकरण होने पर हमे...