मेरी तन्हाई- शहजा़दी (भाग-15)डॉ.पूर्णिमा राय, पंजाब
मेरी तन्हाई- शहजा़दी (भाग-15)
डॉ.पूर्णिमा राय, पंजाब
कॉपी के कागज को डिज़ाइनर अंदाज में और उस पर लिखे हुए चंद वाक्य पढ़कर आँखें तरल हो गई। विगत दिनों की स्मृतियाँ वर्तमान को अपने बहाव में बहा कर ले गईं। याद है मुझे वह दिन साल 2014 फरवरी का महीना था ।वैलेंटाइन डे था ।सब लोग अपने प्यार का इज़हार करते हैं। प्यार करना गलत नहीं है ।प्यार का एहसास और भी अधिक गहरा हो जाता है, जब प्यार में निस्वार्थ भाव होता है। कहते हैं माँ बनना हर औरत का सपना होता है। प्रसव पीड़ा सहन करना हर किसी के हिस्से में नहीं आता। माँ की ममता और वात्सल्य का अहसास तब दोगुना हो जाता है जब हम किसी बेटी की माँ बनते हैं। नन्हें- नन्हें हाथों का स्पर्श ऐसे लगता है, जैसे हम उसमें अपना बचपन जी रहे हैं। आवाज आती है-- "हैप्पी वैलेंटाइन डे" मम्मी! मैं हैरान हो जाती हूँ ।मैं उसको सदैव प्रेरित करते हुए कहती हूँ कि तुम भी कुछ लिखा करो। तुम्हें लिखने का शौक होना चाहिए। तुम अपने मन की बातें कागज पर लिख लिया करो,इससे अच्छा महसूस होता है। मेरी बात सुनकर वह भी कभी-कभी अपनी डायरी खोल लेती थी।जिस भी काग़ज पर कुछ लिखती थी उसके साथ थोड़ी सी पेंटिंग बनाना और उसे थोड़ा डिजाइनर लुक देना उसकी आदत थी।उस दिन फिर उसने अपनी भावनाएँ कागज पर लिख दी। मैंने उसको यह नहीं बताया था कि तुमने क्या लिखना है! मैंनें बस यही कहा था कि तुम लिखो ,तुम भी कुछ लिखा करो। मुझे अच्छा लगेगा। ऐसे ही वह मुझसे छुपाते हुए कमरे के कोने में दुबक कर बैठ गई और मैं रसोई में खाना बनाने चली गई ।कुछ देर बाद वापस आती हूँ तो वह कहती है कि मम्मी मैंनें आपके लिए कुछ लिखा है, मेरी पीठ के पीछे से अपनी दोनों बाहें मेरे गले में डालकर मेरे हाथ में एक कागज थमा देती है।और फिर दूर भाग जाती है। मैं पढ़ती हूँ, उस पर लिखा था-- "मेरी माँ बहुत अच्छी है। वह घर के सारे काम करती है। मेरी माँ हर काम में मेरी मदद करती है ।मेरी माँ मेरे साथ बातें करती है। वह एक अध्यापिका है । मुझे मेरी माँ का साथ बहुत अच्छा लगता है। मैं अपनी माँ को प्यार करती हूँ। आई लव यू मॉम !!" उसके नीचे उसने अपना पता भी लिखा है-- आपकी बेटी !जब यह कागज का टुकड़ा अपने हाथ में लेती हूँ। आँखों से स्पर्श करती हूँ, सीने से लगाती हूँ तो शीतलता का अहसास होता है ।
आज अरसे बाद यह कागज़ जब मेरे हाथों में आया तो मुझे वह दिन फिर से याद आ गया। मुझे याद है तब मोबाइल फोन का अधिक रिवाज नहीं था। बच्चों को भी मोबाइल फोन के बारे में अधिक नहीं पता था । ना ही मोबाइल फोन उनके पास होता था। ऐसे ही हम अपनी बातें कागज पर लिखकर एक दूसरे के साथ बात करते थे। कुछ हाथ से बने हुए जन्मदिन कार्ड मैंने देखे।अब तो जमाना है ऑनलाइन का,ए -आई का! हम आसानी से आनलाइन कार्ड बना लेते हैं, अपने अहसासों को भी लिखवा लेते हैं। पर उस समय में जब मोबाइल का प्रचलन तो था पर हमारे पास इसकी सुविधा इतनी अधिक नहीं थी। बच्चों के पास भी फोन की सुविधा नहीं थी। तब हस्तलिखित कागज एक डोर में बंधे हुए रिश्तों को आसमान की ऊँचाइयों तक ले जाता था। कागज पर उकरे वाक्य को पढ़ते-पढ़ते मुझे वह दिन याद आ गया जिस दिन मैं अस्पताल में थी ।प्रसव पीड़ा सहन कर रही थी। पर अभी समय नहीं आया था ।वह समय आने वाला था और मेरी गोद में 15जून को नन्ही सी गुड़िया आई। जन्मदिन मुबारक हो- मेरी लाडो परी!उसी के हाथ की लिखी हुई लिखावट को जब आज मुझे दोबारा से पढ़ने का मौका मिला तो मैं विगत स्मृतियों में इस तरह खो गई जैसे आज भी वह मेरे सामने घटित हो रहा हो। भावनाओं के बहाव में बह गई, पर उस गहराई को ,उस शीतलता को ,उस प्यार के अहसास को आज भी अपने आप में संजोकर बैठी हुई हूँ । मंद-मंद मुस्कान से हँसती हूँ और सोचती हूँ,आज 15जून है। धीरे-धीरे सब की व्यस्तताएं बढ़ती जाती हैं। शहजा़दी भी धीरे-धीरे बड़ी होने लग गई ।वह पढ़ने के लिये कालेज जाने लग जाती है, हॉस्टल में चली जाती है । मुझे फोन मैसेज में अपनेपन से कहती है- आप अपने लिए अच्छा-अच्छा सामान खरीद लीजिए ।चाहे पर्स ले लो, चाहे सैंडल ले लो ,चाहे कपड़े ले लो, इस बार मैं आपको लेकर दे देती हूँ। मैं हैरान हो जाती हूँ और मंद-मंद मुस्काती हूँ। कैसी बातें करती है, अभी तो इसका मुझसे सामान लेने के दिन है ।माँ थोड़ी ना बच्चों से कुछ लेती है, तो कहती है कि आप इस बात की चिंता मत करो ।आपको बस अपनी इच्छा की चीज खरीदनी है। मेरी फिक्र नहीं करना । मैं प्यार से कहती हूँ," अरे बच्चे! अरे बाबा !जन्मदिन तुम्हारा है, मेरा थोड़े ना है !तुम यह बताओ तुम्हें मुझसे जन्मदिन पर क्या लेना है !वह कहती है ," आपने मुझे यह लाइफ दी है और कुछ नहीं चाहिए ।"यह वाक्य सुनकर मैं निशब्द रह जाती हूँ और भावनाओं की गहराई में धँसती जाती हूँ। अस्पताल का वह कमरा ,वह बिस्तर मुझे याद आ जाता है, जब यह नन्हीं शहजादी को मैंने पहली बार अपनी गोद में लिया था और आँखों से प्यार की गहराई की अविरल धारा बहने लगती है।सोचती हूँ कि बच्चे कब बड़े हो जाते हैं, पता नहीं चलता। पर मां-बाप के लिए वह हमेशा बच्चे ही रहते हैं। क्रमशः
डॉ.पूर्णिमा राय, पंजाब
कॉपी के कागज को डिज़ाइनर अंदाज में और उस पर लिखे हुए चंद वाक्य पढ़कर आँखें तरल हो गई। विगत दिनों की स्मृतियाँ वर्तमान को अपने बहाव में बहा कर ले गईं। याद है मुझे वह दिन साल 2014 फरवरी का महीना था ।वैलेंटाइन डे था ।सब लोग अपने प्यार का इज़हार करते हैं। प्यार करना गलत नहीं है ।प्यार का एहसास और भी अधिक गहरा हो जाता है, जब प्यार में निस्वार्थ भाव होता है। कहते हैं माँ बनना हर औरत का सपना होता है। प्रसव पीड़ा सहन करना हर किसी के हिस्से में नहीं आता। माँ की ममता और वात्सल्य का अहसास तब दोगुना हो जाता है जब हम किसी बेटी की माँ बनते हैं। नन्हें- नन्हें हाथों का स्पर्श ऐसे लगता है, जैसे हम उसमें अपना बचपन जी रहे हैं। आवाज आती है-- "हैप्पी वैलेंटाइन डे" मम्मी! मैं हैरान हो जाती हूँ ।मैं उसको सदैव प्रेरित करते हुए कहती हूँ कि तुम भी कुछ लिखा करो। तुम्हें लिखने का शौक होना चाहिए। तुम अपने मन की बातें कागज पर लिख लिया करो,इससे अच्छा महसूस होता है। मेरी बात सुनकर वह भी कभी-कभी अपनी डायरी खोल लेती थी।जिस भी काग़ज पर कुछ लिखती थी उसके साथ थोड़ी सी पेंटिंग बनाना और उसे थोड़ा डिजाइनर लुक देना उसकी आदत थी।उस दिन फिर उसने अपनी भावनाएँ कागज पर लिख दी। मैंने उसको यह नहीं बताया था कि तुमने क्या लिखना है! मैंनें बस यही कहा था कि तुम लिखो ,तुम भी कुछ लिखा करो। मुझे अच्छा लगेगा। ऐसे ही वह मुझसे छुपाते हुए कमरे के कोने में दुबक कर बैठ गई और मैं रसोई में खाना बनाने चली गई ।कुछ देर बाद वापस आती हूँ तो वह कहती है कि मम्मी मैंनें आपके लिए कुछ लिखा है, मेरी पीठ के पीछे से अपनी दोनों बाहें मेरे गले में डालकर मेरे हाथ में एक कागज थमा देती है।और फिर दूर भाग जाती है। मैं पढ़ती हूँ, उस पर लिखा था-- "मेरी माँ बहुत अच्छी है। वह घर के सारे काम करती है। मेरी माँ हर काम में मेरी मदद करती है ।मेरी माँ मेरे साथ बातें करती है। वह एक अध्यापिका है । मुझे मेरी माँ का साथ बहुत अच्छा लगता है। मैं अपनी माँ को प्यार करती हूँ। आई लव यू मॉम !!" उसके नीचे उसने अपना पता भी लिखा है-- आपकी बेटी !जब यह कागज का टुकड़ा अपने हाथ में लेती हूँ। आँखों से स्पर्श करती हूँ, सीने से लगाती हूँ तो शीतलता का अहसास होता है ।
आज अरसे बाद यह कागज़ जब मेरे हाथों में आया तो मुझे वह दिन फिर से याद आ गया। मुझे याद है तब मोबाइल फोन का अधिक रिवाज नहीं था। बच्चों को भी मोबाइल फोन के बारे में अधिक नहीं पता था । ना ही मोबाइल फोन उनके पास होता था। ऐसे ही हम अपनी बातें कागज पर लिखकर एक दूसरे के साथ बात करते थे। कुछ हाथ से बने हुए जन्मदिन कार्ड मैंने देखे।अब तो जमाना है ऑनलाइन का,ए -आई का! हम आसानी से आनलाइन कार्ड बना लेते हैं, अपने अहसासों को भी लिखवा लेते हैं। पर उस समय में जब मोबाइल का प्रचलन तो था पर हमारे पास इसकी सुविधा इतनी अधिक नहीं थी। बच्चों के पास भी फोन की सुविधा नहीं थी। तब हस्तलिखित कागज एक डोर में बंधे हुए रिश्तों को आसमान की ऊँचाइयों तक ले जाता था। कागज पर उकरे वाक्य को पढ़ते-पढ़ते मुझे वह दिन याद आ गया जिस दिन मैं अस्पताल में थी ।प्रसव पीड़ा सहन कर रही थी। पर अभी समय नहीं आया था ।वह समय आने वाला था और मेरी गोद में 15जून को नन्ही सी गुड़िया आई। जन्मदिन मुबारक हो- मेरी लाडो परी!उसी के हाथ की लिखी हुई लिखावट को जब आज मुझे दोबारा से पढ़ने का मौका मिला तो मैं विगत स्मृतियों में इस तरह खो गई जैसे आज भी वह मेरे सामने घटित हो रहा हो। भावनाओं के बहाव में बह गई, पर उस गहराई को ,उस शीतलता को ,उस प्यार के अहसास को आज भी अपने आप में संजोकर बैठी हुई हूँ । मंद-मंद मुस्कान से हँसती हूँ और सोचती हूँ,आज 15जून है। धीरे-धीरे सब की व्यस्तताएं बढ़ती जाती हैं। शहजा़दी भी धीरे-धीरे बड़ी होने लग गई ।वह पढ़ने के लिये कालेज जाने लग जाती है, हॉस्टल में चली जाती है । मुझे फोन मैसेज में अपनेपन से कहती है- आप अपने लिए अच्छा-अच्छा सामान खरीद लीजिए ।चाहे पर्स ले लो, चाहे सैंडल ले लो ,चाहे कपड़े ले लो, इस बार मैं आपको लेकर दे देती हूँ। मैं हैरान हो जाती हूँ और मंद-मंद मुस्काती हूँ। कैसी बातें करती है, अभी तो इसका मुझसे सामान लेने के दिन है ।माँ थोड़ी ना बच्चों से कुछ लेती है, तो कहती है कि आप इस बात की चिंता मत करो ।आपको बस अपनी इच्छा की चीज खरीदनी है। मेरी फिक्र नहीं करना । मैं प्यार से कहती हूँ," अरे बच्चे! अरे बाबा !जन्मदिन तुम्हारा है, मेरा थोड़े ना है !तुम यह बताओ तुम्हें मुझसे जन्मदिन पर क्या लेना है !वह कहती है ," आपने मुझे यह लाइफ दी है और कुछ नहीं चाहिए ।"यह वाक्य सुनकर मैं निशब्द रह जाती हूँ और भावनाओं की गहराई में धँसती जाती हूँ। अस्पताल का वह कमरा ,वह बिस्तर मुझे याद आ जाता है, जब यह नन्हीं शहजादी को मैंने पहली बार अपनी गोद में लिया था और आँखों से प्यार की गहराई की अविरल धारा बहने लगती है।सोचती हूँ कि बच्चे कब बड़े हो जाते हैं, पता नहीं चलता। पर मां-बाप के लिए वह हमेशा बच्चे ही रहते हैं। क्रमशः
Comments
Post a Comment