मेरी तन्हाई-आँधी-तूफान (भाग-13)डॉ.पूर्णिमा राय, पंजाब
मेरी तन्हाई-आँधी-तूफान (भाग-13)
डॉ.पूर्णिमा राय, पंजाब
आँधी तूफान, कड़कती बिजली, गरज़ते बादल ,उड़ते धूलकण, तेज बारिश की बूंदों के साथ सब इधर-उधर बिखरा हुआ दिख रहा था ।राहगीरों को भी मुश्किल हो गई थी ।यहाँ तक कि दुकानों का सामान भी इधर-उधर भाग-दौड़ कर रहा था। कुछ लोग आँधी को चीरते हुए अपने गंतव्य की ओर जा रहे थे और कुछ तेज़ आंधी में तेज़ तूफान में अपने आप को बचाने का प्रयास कर रहे थे फिर भी वह सड़क पर लुढ़क जाते हैं। लुढ़क गए इंसान के साथ-साथ कुदरत का भीषण रूप दीखता है। पेड़-पौधे ,वृक्ष चहुं ओर रास्तों में बिखर गए ।कहीं रास्तों पर जाम लग गया और कहीं कुदरत ने आकर लोगों को रोक दिया। रुकने के लिए मजबूर कर दिया ।गर्मी की तपिश से तो आराम मिला था पर जो आँधी आई ,तूफान आया, बिजली कौंधी एवं बारिश हुई, उस वजह से न जाने कितने घरों की छतें उड़ गई। कितने लोग घर से बेघर हो गए ।कुछ लोगों का सामान टूट गया। कुछ लोगों के छप्पर उड़ गए, पर जो लोग कारों से जा रहे थे, वे उस बारिश का आनंद ले रहे थे ।उनको उस आँधी का, तूफान का ,बारिश का बिल्कुल भी फर्क नहीं पड़ रहा था ।जैसा मुझे लग रहा था।यहाँ तक कि ई-रिक्शा वाले भी बहुत मुश्किल से ई-रिक्शा चला रहे थे ।इतनी तेज़ तूफान में घर से अगर कोई मुसाफिर यह सोचकर निकला था कि वह अपनी मंजिल पर 5 मिनट में पहुँच जाएगा और 5 मिनट में ही वापस आ जाएगा ,उसे तकरीबन 3 घंटे लग गये क्योंकि आँधी -तूफान की वजह से वह रास्ते में ही अटक गया ।कहते हैं मुश्किल जब आती है तो बता कर नहीं आती है ।हम अपनी कल्पना के अनुसार जीवन जीने का प्रयास करते हैं पर कल्पनाएं कभी पूर्ण हो ,ऐसा नहीं होता। आस उम्मीद रखते हैं पर आज उम्मीद पर ही जिंदगी नहीं चलती ,उसके लिए कर्म करना पड़ता है। मैं भी अपने मोबाइल फोन को लेने के लिए जो कि रिपेयर सेंटर पर था ,घर से निकल पड़ी ।हल्की-हल्की हवा चल रही थी पर जैसे ही मैं आगे बड़ी तो एकदम से आँधी आ गई ।आँधी आई तो मैंने सोचा घर वापस चले जाती हूँ। मैंनें अपने स्कूटर को वापस रोक लिया और घर आ गई। फिर मन में आया कि मोबाइल नहीं है तो अब समय कैसे देखूँगी क्योंकि घर में कोई घड़ी भी नहीं थी। मोबाइल फोन आ जाने से घरों में दीवार-घड़ी लगानी और हाथों में घड़ी बांधने का रिवाज ना मात्र ही रह चुका था, शायद यही वजह थी कि घड़ी की कभी जरूरत ही नहीं पड़ी ।फिर सोचा ले ही आती हूँ।मैं फिर घर से निकल पड़ी और अभी मैं कुछ दूरी पर ही गई थी कि एकदम तीव्रगति से आता हुआ एक बहुत बड़ा लिफाफा या कोई वस्तु थी वह मेरे एक्टिवा के एकदम आगे आ गया।जिस वजह से मैं घबरा गई और मैंने एक्टिवा को एकदम से ब्रेक लगा दिया। इतने में इतनी तेज आँधी आई कि मेरे सामने चीज़ें इधर-उधर बिखरने लगी और मैंने अपना स्कूटर एक तरफ रोक लिया और एक दुकान के पास खड़ी हो गई। दुकान के अंदर एक बुजुर्ग थे ।उन्होंने मुझे बोला, बेटा ,आप अंदर आ जाइए !यहाँ बैठ जाओ। उन्होंने मुझे बैठने के लिए कुर्सी दे दी ।मैं काफी देर तक उस दुकान पर बैठी रही ,पर मन में यही आ रहा था कि यह तूफान कब रुकेगा! तूफान के कर्मचारी बाहर निकल कर वीडियो बना रहे थे। लोगों के आने-जाने को अपने कैमरे में कैद कर रहे थे ।तूफान के दृश्य को कैमरे में उतार रहे थे। इस बीच धीरे-धीरे बारिश आनी शुरू हो गई और इतनी तेज़ बारिश आई कि लोग बहुत भीगते हुए नजर आने लगे ।ई-रिक्शा भी संभाले नहीं संभल रहा था ।पानी की बूंदे दुकान के अंदर भी थोड़ी-थोड़ी आना शुरू हो गई थी ।मुझे वहाँ बैठे हुए एक घंटे से अधिक समय हो गया था। इतने में वह बुजुर्ग कहते हैं कि मैं अपने रिक्शा वाले से पूछता हूँ। अगर वह आ जाए तो आपको आपकी मंजिल की ओर ले जाएगा तो मैंने कहा ,आपका बहुत शुक्रिया!! पर थोड़ी देर बाद उन्होंने बताया कि बारिश चारों तरफ बहुत तेज हो रही है! ई-रिक्शा का आना मुश्किल है तो मैंने कहा-- कोई बात नहीं ,थोड़ी देर और रुक जाती हूँ। शायद कोई और ई-रिक्शा आ जाएगा । बुजुर्ग ने कहा कि ई-रिक्शा से भी जाना आपको मुश्किल हो जाएगा ।बारिश बहुत तेज हो गई है ।बस ऐसे ही कभी अपने घर की फिक्र करती हुई कभी मैं अपने मोबाइल की फिक्र करती हुई बिना कुछ कहे चुपचाप ऐसे ही वहाँ शांत बैठी रही और फिर काफी समय बाद जब बारिश रुकी तो मैं अपने गंतव्य की ओर बढ़ गई ।जब मैं गई तो मैंने देखा कि रास्ते में चारों तरफ कुदरत ने अपना रंग-रूप दिखाया हुआ है !पेड़ बिखरे हुए थे !आने-जाने वाले लोगों को मुश्किल हो रही थी ।वृक्षों की टहनियों गिरकर सड़क के बीच में आ चुकी थी ।बारिश रुकने की वजह से सभी लोगों में भागम-भाग मची हुई थी कि हम अपने सही स्थान पर पहुँच जाए। कुछ समय पश्चात मैं वापस अपने घर आई और आते हुए रास्ते में मेरे मन में यही विचार आ रहा था कि मेरे घर में कोई चीज इधर-उधर ना हो गई हो ।कोई सामान बिखर ना गया हो। कोई नुकसान ना हो गया हो ,पर जब मैं घर वापस आई तो मैंने देखा कि सारी चीज़ें अपने ही स्थान पर थी। एक छोटा सा फूलदान था जो मैंने बालकनी में रखा था और मुझे लग रहा था कि वह भी उड़ गया होगा, पर ऐसा नहीं हुआ था ।कहते हैं छोटी-छोटी चीजें भी आँधी तूफान में बच जाती हैं और जो बड़ी चीज होती हैं वह आँधी-तूफान में ढह जाती है ।इसलिए कहते हैं --घमंड नहीं करना चाहिए। हमें सदैव नम्रता में रहना चाहिए ।छोटे बनने में जो मज़ा है, बड़े बनने में नहीं। क्रमशः
डॉ.पूर्णिमा राय, पंजाब
आँधी तूफान, कड़कती बिजली, गरज़ते बादल ,उड़ते धूलकण, तेज बारिश की बूंदों के साथ सब इधर-उधर बिखरा हुआ दिख रहा था ।राहगीरों को भी मुश्किल हो गई थी ।यहाँ तक कि दुकानों का सामान भी इधर-उधर भाग-दौड़ कर रहा था। कुछ लोग आँधी को चीरते हुए अपने गंतव्य की ओर जा रहे थे और कुछ तेज़ आंधी में तेज़ तूफान में अपने आप को बचाने का प्रयास कर रहे थे फिर भी वह सड़क पर लुढ़क जाते हैं। लुढ़क गए इंसान के साथ-साथ कुदरत का भीषण रूप दीखता है। पेड़-पौधे ,वृक्ष चहुं ओर रास्तों में बिखर गए ।कहीं रास्तों पर जाम लग गया और कहीं कुदरत ने आकर लोगों को रोक दिया। रुकने के लिए मजबूर कर दिया ।गर्मी की तपिश से तो आराम मिला था पर जो आँधी आई ,तूफान आया, बिजली कौंधी एवं बारिश हुई, उस वजह से न जाने कितने घरों की छतें उड़ गई। कितने लोग घर से बेघर हो गए ।कुछ लोगों का सामान टूट गया। कुछ लोगों के छप्पर उड़ गए, पर जो लोग कारों से जा रहे थे, वे उस बारिश का आनंद ले रहे थे ।उनको उस आँधी का, तूफान का ,बारिश का बिल्कुल भी फर्क नहीं पड़ रहा था ।जैसा मुझे लग रहा था।यहाँ तक कि ई-रिक्शा वाले भी बहुत मुश्किल से ई-रिक्शा चला रहे थे ।इतनी तेज़ तूफान में घर से अगर कोई मुसाफिर यह सोचकर निकला था कि वह अपनी मंजिल पर 5 मिनट में पहुँच जाएगा और 5 मिनट में ही वापस आ जाएगा ,उसे तकरीबन 3 घंटे लग गये क्योंकि आँधी -तूफान की वजह से वह रास्ते में ही अटक गया ।कहते हैं मुश्किल जब आती है तो बता कर नहीं आती है ।हम अपनी कल्पना के अनुसार जीवन जीने का प्रयास करते हैं पर कल्पनाएं कभी पूर्ण हो ,ऐसा नहीं होता। आस उम्मीद रखते हैं पर आज उम्मीद पर ही जिंदगी नहीं चलती ,उसके लिए कर्म करना पड़ता है। मैं भी अपने मोबाइल फोन को लेने के लिए जो कि रिपेयर सेंटर पर था ,घर से निकल पड़ी ।हल्की-हल्की हवा चल रही थी पर जैसे ही मैं आगे बड़ी तो एकदम से आँधी आ गई ।आँधी आई तो मैंने सोचा घर वापस चले जाती हूँ। मैंनें अपने स्कूटर को वापस रोक लिया और घर आ गई। फिर मन में आया कि मोबाइल नहीं है तो अब समय कैसे देखूँगी क्योंकि घर में कोई घड़ी भी नहीं थी। मोबाइल फोन आ जाने से घरों में दीवार-घड़ी लगानी और हाथों में घड़ी बांधने का रिवाज ना मात्र ही रह चुका था, शायद यही वजह थी कि घड़ी की कभी जरूरत ही नहीं पड़ी ।फिर सोचा ले ही आती हूँ।मैं फिर घर से निकल पड़ी और अभी मैं कुछ दूरी पर ही गई थी कि एकदम तीव्रगति से आता हुआ एक बहुत बड़ा लिफाफा या कोई वस्तु थी वह मेरे एक्टिवा के एकदम आगे आ गया।जिस वजह से मैं घबरा गई और मैंने एक्टिवा को एकदम से ब्रेक लगा दिया। इतने में इतनी तेज आँधी आई कि मेरे सामने चीज़ें इधर-उधर बिखरने लगी और मैंने अपना स्कूटर एक तरफ रोक लिया और एक दुकान के पास खड़ी हो गई। दुकान के अंदर एक बुजुर्ग थे ।उन्होंने मुझे बोला, बेटा ,आप अंदर आ जाइए !यहाँ बैठ जाओ। उन्होंने मुझे बैठने के लिए कुर्सी दे दी ।मैं काफी देर तक उस दुकान पर बैठी रही ,पर मन में यही आ रहा था कि यह तूफान कब रुकेगा! तूफान के कर्मचारी बाहर निकल कर वीडियो बना रहे थे। लोगों के आने-जाने को अपने कैमरे में कैद कर रहे थे ।तूफान के दृश्य को कैमरे में उतार रहे थे। इस बीच धीरे-धीरे बारिश आनी शुरू हो गई और इतनी तेज़ बारिश आई कि लोग बहुत भीगते हुए नजर आने लगे ।ई-रिक्शा भी संभाले नहीं संभल रहा था ।पानी की बूंदे दुकान के अंदर भी थोड़ी-थोड़ी आना शुरू हो गई थी ।मुझे वहाँ बैठे हुए एक घंटे से अधिक समय हो गया था। इतने में वह बुजुर्ग कहते हैं कि मैं अपने रिक्शा वाले से पूछता हूँ। अगर वह आ जाए तो आपको आपकी मंजिल की ओर ले जाएगा तो मैंने कहा ,आपका बहुत शुक्रिया!! पर थोड़ी देर बाद उन्होंने बताया कि बारिश चारों तरफ बहुत तेज हो रही है! ई-रिक्शा का आना मुश्किल है तो मैंने कहा-- कोई बात नहीं ,थोड़ी देर और रुक जाती हूँ। शायद कोई और ई-रिक्शा आ जाएगा । बुजुर्ग ने कहा कि ई-रिक्शा से भी जाना आपको मुश्किल हो जाएगा ।बारिश बहुत तेज हो गई है ।बस ऐसे ही कभी अपने घर की फिक्र करती हुई कभी मैं अपने मोबाइल की फिक्र करती हुई बिना कुछ कहे चुपचाप ऐसे ही वहाँ शांत बैठी रही और फिर काफी समय बाद जब बारिश रुकी तो मैं अपने गंतव्य की ओर बढ़ गई ।जब मैं गई तो मैंने देखा कि रास्ते में चारों तरफ कुदरत ने अपना रंग-रूप दिखाया हुआ है !पेड़ बिखरे हुए थे !आने-जाने वाले लोगों को मुश्किल हो रही थी ।वृक्षों की टहनियों गिरकर सड़क के बीच में आ चुकी थी ।बारिश रुकने की वजह से सभी लोगों में भागम-भाग मची हुई थी कि हम अपने सही स्थान पर पहुँच जाए। कुछ समय पश्चात मैं वापस अपने घर आई और आते हुए रास्ते में मेरे मन में यही विचार आ रहा था कि मेरे घर में कोई चीज इधर-उधर ना हो गई हो ।कोई सामान बिखर ना गया हो। कोई नुकसान ना हो गया हो ,पर जब मैं घर वापस आई तो मैंने देखा कि सारी चीज़ें अपने ही स्थान पर थी। एक छोटा सा फूलदान था जो मैंने बालकनी में रखा था और मुझे लग रहा था कि वह भी उड़ गया होगा, पर ऐसा नहीं हुआ था ।कहते हैं छोटी-छोटी चीजें भी आँधी तूफान में बच जाती हैं और जो बड़ी चीज होती हैं वह आँधी-तूफान में ढह जाती है ।इसलिए कहते हैं --घमंड नहीं करना चाहिए। हमें सदैव नम्रता में रहना चाहिए ।छोटे बनने में जो मज़ा है, बड़े बनने में नहीं। क्रमशः
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