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Showing posts from September, 2025

बात जो दिल को छू गई!

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बात जो दिल को छू गई!   पोस्ट संख्या-71 पिछले कुछ दिनों से स्कूल छात्रों की मौखिक और लिखित जांच करने के लक्ष्य से अलग-अलग स्कूलों का दौरा करने की ड्यूटी लगी है।इसी दौरान प्रतिदिन नए-नए स्कूल और अलग-अलग कक्षाओं के छात्रों से मिलने का सुअवसर प्राप्त हुआ।कभी-कभी कुछ बच्चे सहज भाव में ऐसी बातें कह जाते हैं जो दिल को छू जाती हैं। मैडम !आप हमारे स्कूल में 2:00 बजे तक रुकेंगे? क्या आप हमें हिंदी पढ़ाया करेंगे? क्या आप हमें कल फिर पढ़ाने आएंगे? आपने हमें बहुत अच्छा पढ़ाया है! बच्चे यही कह रहे थे कि हमें आपसे मिलकर अच्छा लगा। इतने सारे जवाबों से घिरे हुए प्रश्नों की मुझे उम्मीद नहीं थी। और न ही मैंनें छात्रों से अभी अपनी कोई विशेष बात प्रारंभ की थी ।मैंने तो महज़ बच्चों से अपनेपन से यही पूछा था कि आप सब कैसे हो? मुझे देखकर तुम लोगों को डर तो नहीं लग रहा! ।बच्चों के इन प्रश्नों को सुनकर मुझे समझ नहीं आ रहा था कि क्या उत्तर दूँ। फिर मैंने भी सहज भाव में कह दिया ,आप सब अच्छा पढ़ोगे तो मैं फिर आपको मिलने आऊँगी। अगली बार जब मैं आपके स्कूल आऊँगी तो मैं आपको कक्षा में जरूर पढ़ाऊँगी। इस बार तो मैं...

वक्त

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वक्त ( कविता) पोस्ट संख्या -70 घड़ी की चलती सूई देखती हूँ  तो तनिक होती है  हलचल मन में कितना लंबा सफर   तय कर लिया  इस नाजुक तन ने वक्त तो संभाल लेती हूँ  दिमाग की लगाकर ताकत दिल नहीं संभल पाता और  निढाल होती जाती है काया!! दिल को संभाल पाने का हुनर  सीख पाऊँ यदि तो वक्त को संभालने में  फिर दिमाग लगाने की  ना पड़ेगी जरूरत!! वक्त और दिल का तालमेल "पूर्णिमा" बिठाना आ जाए कहीं जन्नत सी दुनिया और  खुशहाल जिंदगानी दिखेगी यहीं!! डॉ.पूर्णिमा राय, पंजाब  21/9/25

ए खुदा ,रुक जा ज़रा!

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  ए खुदा ,रुक जा ज़रा! By Dr.Purnima Rai पोस्ट संख्या -69 ए खुदा ,रुक जा ज़रा माना कि तुझसे सहा न जाये पृथ्वी का दर्द! पर इस तरह नाराज़ होना , तेरा बरबस बरसना बेइंतहां है !! ये सृष्टि तेरा ही तो आधार है पानी जीवन का स्रोत है भयावह मंजर न दिखा मृत्यु का भंयकर खेल न खेल!! सजीव निर्जीव हो रहे हैं आहत तनिक रहम कर , रात भी कटती बेचैन सी, सुबह भी कचोटती है ,दे रही ज़ख़्म गहरे क्यों न सुनता हरेक जन  की पुकार लगता है मेरा खुदा सच में हो गया है बहरा!! तू भूल गया था शायद कि तेरे संसार में , अब बचा प्यार नहीं, आपसी मिलवर्तन नहीं , मत परख अपने बनाये जहान को न ले परीक्षा बार -बार , देख ,खोल ले अपने नयन अश्रु सजीली बूढ़ी आँखों में झांक तेरी टेक ही है बस उनको तू यही चाहता था,देख वही हो रहा है, तेरे बनाये मनुज ही तो इस वक्त दे रहे सहारा हैं बस थम जा ,थम जा!! नज़र हो परखने की तो इंसान भी भगवान है निष्काम सेवा ही तो मानवता की पहचान है !! डॉ.पूर्णिमा राय, पंजाब 07/09/25