वक्त

वक्त ( कविता)



पोस्ट संख्या -70

घड़ी की चलती सूई देखती हूँ

 तो तनिक होती है 

हलचल मन में

कितना लंबा सफर 

 तय कर लिया 

इस नाजुक तन ने

वक्त तो संभाल लेती हूँ

 दिमाग की लगाकर ताकत

दिल नहीं संभल पाता और 

निढाल होती जाती है काया!!

दिल को संभाल पाने का हुनर 

सीख पाऊँ यदि

तो वक्त को संभालने में 

फिर दिमाग लगाने की

 ना पड़ेगी जरूरत!!

वक्त और दिल का तालमेल "पूर्णिमा"

बिठाना आ जाए कहीं

जन्नत सी दुनिया और 

खुशहाल जिंदगानी दिखेगी यहीं!!

डॉ.पूर्णिमा राय, पंजाब 

21/9/25

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