हिंद दी चादर-- श्री गुरु तेग बहादुर जी
हिंद दी चादर-- श्री गुरु तेग बहादुर जी
पोस्ट संख्या-75
श्री गुरु तेग बहादुर जी सिक्ख धर्म के नौवें गुरु थे, जिनका जन्म 21 अप्रैल 1621 को अमृतसर में हुआ था। इनके बचपन का नाम त्यागमल था और वे गुरु हरगोबिंद साहिब जी के सबसे छोटे पुत्र थे। गुरु तेग बहादुर जी का पालन-पोषण साहसी और धार्मिक वातावरण में हुआ। उन्होंने तलवारबाज़ी, तीरंदाजी और घुड़सवारी जैसे युद्ध कौशल भी सीखे। मात्र 13 वर्ष की आयु में ही उन्होंने अपने पिता के साथ मुगलों से युद्ध में भाग लिया था, जिससे उन्हें 'तेग बहादुर' नाम मिला। सन् 1664 ई में, गुरु हरिकृष्ण जी के देहांत के बाद गुरु तेग बहादुर जी सिक्खों के नौंवें गुरु बने। उन्होंने अपने जीवन में कई स्थानों की यात्रा कर गरीबों की मदद की और सिक्ख समुदाय को संगठित किया। उनके उपदेशों में सभी धर्मों की स्वतंत्रता और मानवता की रक्षा का संदेश मिलता है।इन्हें 'हिंद की चादर' भी कहा जाता है,हिंद दी चादर' का अर्थ है 'हिंदुस्तान की ढाल' या 'भारत की रक्षा करने वाला'। क्योंकि उन्होंने धर्म, मानवता, और अत्याचार के विरुद्ध अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान दिया था।गुरु तेग बहादुर जी के समय में मुगल शासक औरंगजेब ने जबरन धर्म परिवर्तन और अत्याचार का मार्ग अपनाया। कश्मीरी पंडितों और धार्मिक स्वतंत्रता को बचाने के लिए गुरु तेग बहादुर जी ने अपने जीवन का बलिदान दे दिया।उन्होंने पूरे हिंद समाज और धार्मिक स्वतंत्रता की ढाल बनकर अपना कर्तव्य निभाया।मुगल बादशाह औरंगजेब के अत्याचारों के विरोध में गुरु तेग बहादुर जी ने कश्मीरी पंडितों और धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए अपना शीश दे दिया। सन् 1675 ई में दिल्ली में उनका सार्वजनिक रूप से सिर कलम कर दिया गया। उनकी शहादत ने न केवल सिक्ख पंथ को मज़बूत किया बल्कि पूरे मानव समाज को साहस, धर्म और सद्भावना की मिसाल दी।
'हिंद दी चादर' शब्द का स्रोत सिक्ख पंथ के इतिहास और लोकसभा में गुरु तेग बहादुर जी के असाधारण बलिदान से जुड़ा है। यह उपाधि सबसे पहले गुरु तेग बहादुर जी को दी गई थी, जब उन्होंने कश्मीरी पंडितों और हिंदू धर्म की रक्षा के लिए अपना जीवन बलिदान किया।इतिहासकारों और सिक्ख साहित्य के अनुसार, 'हिंद दी चादर' शब्द गुरु तेग बहादुर जी की शहादत (1675) के बाद प्रसिद्ध हुआ। उनके धार्मिक और सामाजिक साहस पर पंजाबी-हिन्दी में कविता, ग्रंथ और विमर्श में यह उपाधि बार-बार आती है। गुरु तेग बहादुर जी के योगदान के चलते सिक्ख समाज, इतिहासकार और धार्मिक ग्रंथों में उन्हें 'हिंद दी चादर' कहकर संबोधित किया जाने लगा।यह उपाधि पंजाबी इतिहास लेखकों और सिक्ख विद्वानों, जैसे तेजा सिंह सोढ़ी (1957), द्वारा उपयोग में लाई गई।गुरु तेग बहादुर जी की शहादत को याद करने वाले धार्मिक आयोजन, ग्रंथ और श्रद्धांजलि समारोहों में यह उपाधि सामान्य रूप से सम्मान में दी जाती है।गुरु तेग बहादुर जी ने अपने अनुयायियों को साहस, त्याग और सत्य का मार्ग अपनाने की प्रेरणा दी। उनकी वाणी और उपदेश, गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित हैं, जो आज भी मानवता का मार्गदर्शन करते हैं।गुरु तेग बहादुर जी सच्चे अर्थों में मानवता के रक्षक थे।गुरु तेग बहादुर जी की शहादत मानव अधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता के इतिहास में अनूठी मानी जाती है।उनकी याद में दिल्ली के चांदनी चौक में गुरुद्वारा शीशगंज साहिब बनाया गया है, जो उनकी वीरता और बलिदान का स्मारक है।
डॉ.पूर्णिमा, पंजाब
इन्द्रनाथ मदान आलोचना पुरस्कार विजेता
भाषा विभाग पटियाला
7087775713

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