मेरी तन्हाई---सलीका (भाग-11)डॉ.पूर्णिमा राय, पंजाब
मेरी तन्हाई---सलीका (भाग-11)
डॉ.पूर्णिमा राय, पंजाब
प्रेरणा सदैव प्रगति की प्रतीक है। तभी तो कहते हैं कि आपके जीवन में प्रेरक लोगों का होना बहुत ही जरुरी है जो आपको प्रेरित कर सकें। आपके मन को सकारात्मक ऊर्जा से भर सके । आज जब सुबह उठी तो स्वास्थ्य काफी अच्छा महसूस कर रहा था।आज मन हुआ कि चलो थोड़ा किचन की ही देखभाल कर ली जाए। किचन में वैसे तो हम लोग खाने-पीने के लिए ही जाते हैं और बहुत कम ऐसा होता है कि किचन के कॉर्नर की सफाई की जाए ।चीजों को इधर--उधर करके देखा जाए ।फालतू चीजों को बाहर निकाला जाए । वैसे भी नौकरी की भागदौड़ में समय ही नहीं मिलता है कि हम रूटीन से हटकर कार्य कर पाएं।यह सब काम तभी हो पाते हैं, जब आपका मन सकारात्मक ऊर्जा से भरा होता है और जब आलस आपसे कोसों दूर हो जाता है ।ऐसे ही आज अपनी मस्ती में सुबह उठकर जल्दी से चाय के साथ रस लिया और अपनी रूटीन की दवाई खाई।फिर किचन का साफ-सफाई का कार्य करने लग गई।सोचा धीरे-धीरे थोड़ा-थोड़ा करके साफ-सफाई करती हूँ। अपनी ही मस्ती में कभी पानी में हाथ धो रही हूँ। कभी किसी बर्तन को साफ कर रही हूँ। कभी किचन के बॉक्स को साफ कर रही थी।कभी गमले में लगे हुए पौधों को देख रही थी। कभी पैकेट में पड़े हुए सामान को साफ किए हुए डिब्बों में भरकर अच्छे से व्यवस्थित कर रही थी। इसी बीच मुझे प्रोफेसर डॉ.संजय जी का फोन आता है कि पूर्णिमा जी, कैसी हैं तो मैंने कहा,जी हां, मैं बिल्कुल ठीक हूँ। अवकाश के दिन हैं,क्या घर पर ही हैं या कहीं घूमने गई हैं, तो मैंने कहा कि नहीं घर पर ही हूँ तो उन्होंने कहा- अनिल पांडे जी फगवाड़ा से आए हुए हैं। आपसे मिलना चाहते हैं। सुनकर मुझे अति प्रसन्नता हुई तो मैंनें शीघ्रता में पूछ लिया कि आप कितने समय तक आएंगे तो उन्होंने कहा कि अभी हम आधे घंटे तक आ जाएंगे । अभी हम शीतांशु सर जी के घर पर बैठे हुए हैं । डॉ .शीतांशु जी का नाम सुनकर एक पल को हुआ कि मैं भी अभी सब कुछ छोड़कर वहीं पर सर को भी मिलने चले जाऊं और डॉ अनिल जी से और डॉ संजय जी से वहीं पर मुलाकात हो जाएगी। डॉ. शीतांशु जी जो कि मेरे गुरु है, उनका जिक्र आते ही कुछ पल के लिए एहसास हुआ कि मैं भी कितने समय से उनको नहीं मिल पा रही हूँ। पर फिर मेरे मन में विचार कौंधा कि आधे घंटे बाद मेरे घर पर मुझे मिलने के लिए दो साहित्यकार आ रहे हैं तो जल्दी-जल्दी मैं किचन का काम समाप्त करने की ठान लेती हूंँ। जो मैं पहले धीमी गति से चल रही थी। मैंने तेज गति के साथ सारे किचन की साफ-सफाई करना शुरू कर दिया और जल्दी से फ्री होकर नहा-धोकर मैं अभी यही सोच रही थी कि कुछ सामान जल्दी से मंगवा लेती हूँ और इतने में डॉ संजय का फोन आ जाता है कि मैडम हम आपके घर के निकट पहुँच गए हैं, आगे कहाँ पर आना है तो मैंने उनको अपने घर का रास्ता समझा दिया तो वह आराम से मेरे घर के पास आ गए ।इसी बीच मैंनें जल्दी से अपने करियाना स्टोर पर फोन किया कि मुझे यह दो-तीन चीज जल्दी से भेज दीजिए ।गर्मी के दिन है तो उन्होंने भी मेरी बात का मान रखा और जल्दी से अपने कर्मचारी को भेजकर मेरे घर पर सामान पहुँचा दिया। पहले मैंने सोचा कि गर्मी है फ्रिज में रखे हुए दही की मैं लस्सी बना लेती हूँ। जैसे ही मैंने दही का बाऊल फ्रिज से निकाला वह मेरे हाथ से गिर गया। मैंने कहा, ओहो! यह क्या हो रहा है ?जल्दी-जल्दी में मैंने वह साफ किया।इस के बाद जब मैंनें कोल्ड ड्रिंक को खोला तो कोल्ड ड्रिंक बोतल में भाप बनी हुई थी, वह थोड़ी सी रसोई के शैल्फ के ऊपर गिर गई और फिर मुझे वहाँ पर सफाई करनी पड़ गई। मैं सोच रही थी, अरे, बाबा! आज हो क्या रहा है? शायद यह मेरी जल्दबाजी थी या उत्सुकता थी कि उनके सामने घर को थोड़ा सलीके से पेश किया जाए। घर की हर चीज सलीके से रखी दिखनी चाहिए। उन्होंने मुझे कहा कि कोई बात नहीं। सब घरों में ऐसे ही सामान बिखरा रहता है आप इतनी टेंशन नहीं लीजिए। लेकिन आपने यह जो पौधे मेज़ पर सजाकर रखे हुए हैं यह बहुत ही अच्छे से लग रहे हैं। बड़ी अच्छी तरह से अपने पौधों की देखभाल की हुई है, तब सुनकर अच्छा लगा कि चलो कोई चीज तो घर पर व्यवस्थित ढंग से रखी हुई है। काफी समय तक चाय के दौर के साथ साहित्यिक बातचीत होती रही जिसमें पुस्तकों की चर्चा, साहित्यिक विचार चर्चा ,प्रकाशन की जिम्मेदारी एवं समस्याएं आदि के बारे में वार्तालाप होता रहा ।इतना ही नहीं, पुस्तकों के प्रति लोगों के कम अधिक होते हुए रुझान के ऊपर , पुस्तकों को पढ़ने की रुचि के संबंध में भी बातचीत होती रही और समय का पता ही नहीं चला कि कब समय बीत गया। कहते हैं सकारात्मक ऊर्जा से दिन का आरंभ हो तो सारा दिन सकारात्मक ऊर्जा ही भरी रहती है।
क्रमशः
डॉ.पूर्णिमा राय, पंजाब
प्रेरणा सदैव प्रगति की प्रतीक है। तभी तो कहते हैं कि आपके जीवन में प्रेरक लोगों का होना बहुत ही जरुरी है जो आपको प्रेरित कर सकें। आपके मन को सकारात्मक ऊर्जा से भर सके । आज जब सुबह उठी तो स्वास्थ्य काफी अच्छा महसूस कर रहा था।आज मन हुआ कि चलो थोड़ा किचन की ही देखभाल कर ली जाए। किचन में वैसे तो हम लोग खाने-पीने के लिए ही जाते हैं और बहुत कम ऐसा होता है कि किचन के कॉर्नर की सफाई की जाए ।चीजों को इधर--उधर करके देखा जाए ।फालतू चीजों को बाहर निकाला जाए । वैसे भी नौकरी की भागदौड़ में समय ही नहीं मिलता है कि हम रूटीन से हटकर कार्य कर पाएं।यह सब काम तभी हो पाते हैं, जब आपका मन सकारात्मक ऊर्जा से भरा होता है और जब आलस आपसे कोसों दूर हो जाता है ।ऐसे ही आज अपनी मस्ती में सुबह उठकर जल्दी से चाय के साथ रस लिया और अपनी रूटीन की दवाई खाई।फिर किचन का साफ-सफाई का कार्य करने लग गई।सोचा धीरे-धीरे थोड़ा-थोड़ा करके साफ-सफाई करती हूँ। अपनी ही मस्ती में कभी पानी में हाथ धो रही हूँ। कभी किसी बर्तन को साफ कर रही हूँ। कभी किचन के बॉक्स को साफ कर रही थी।कभी गमले में लगे हुए पौधों को देख रही थी। कभी पैकेट में पड़े हुए सामान को साफ किए हुए डिब्बों में भरकर अच्छे से व्यवस्थित कर रही थी। इसी बीच मुझे प्रोफेसर डॉ.संजय जी का फोन आता है कि पूर्णिमा जी, कैसी हैं तो मैंने कहा,जी हां, मैं बिल्कुल ठीक हूँ। अवकाश के दिन हैं,क्या घर पर ही हैं या कहीं घूमने गई हैं, तो मैंने कहा कि नहीं घर पर ही हूँ तो उन्होंने कहा- अनिल पांडे जी फगवाड़ा से आए हुए हैं। आपसे मिलना चाहते हैं। सुनकर मुझे अति प्रसन्नता हुई तो मैंनें शीघ्रता में पूछ लिया कि आप कितने समय तक आएंगे तो उन्होंने कहा कि अभी हम आधे घंटे तक आ जाएंगे । अभी हम शीतांशु सर जी के घर पर बैठे हुए हैं । डॉ .शीतांशु जी का नाम सुनकर एक पल को हुआ कि मैं भी अभी सब कुछ छोड़कर वहीं पर सर को भी मिलने चले जाऊं और डॉ अनिल जी से और डॉ संजय जी से वहीं पर मुलाकात हो जाएगी। डॉ. शीतांशु जी जो कि मेरे गुरु है, उनका जिक्र आते ही कुछ पल के लिए एहसास हुआ कि मैं भी कितने समय से उनको नहीं मिल पा रही हूँ। पर फिर मेरे मन में विचार कौंधा कि आधे घंटे बाद मेरे घर पर मुझे मिलने के लिए दो साहित्यकार आ रहे हैं तो जल्दी-जल्दी मैं किचन का काम समाप्त करने की ठान लेती हूंँ। जो मैं पहले धीमी गति से चल रही थी। मैंने तेज गति के साथ सारे किचन की साफ-सफाई करना शुरू कर दिया और जल्दी से फ्री होकर नहा-धोकर मैं अभी यही सोच रही थी कि कुछ सामान जल्दी से मंगवा लेती हूँ और इतने में डॉ संजय का फोन आ जाता है कि मैडम हम आपके घर के निकट पहुँच गए हैं, आगे कहाँ पर आना है तो मैंने उनको अपने घर का रास्ता समझा दिया तो वह आराम से मेरे घर के पास आ गए ।इसी बीच मैंनें जल्दी से अपने करियाना स्टोर पर फोन किया कि मुझे यह दो-तीन चीज जल्दी से भेज दीजिए ।गर्मी के दिन है तो उन्होंने भी मेरी बात का मान रखा और जल्दी से अपने कर्मचारी को भेजकर मेरे घर पर सामान पहुँचा दिया। पहले मैंने सोचा कि गर्मी है फ्रिज में रखे हुए दही की मैं लस्सी बना लेती हूँ। जैसे ही मैंने दही का बाऊल फ्रिज से निकाला वह मेरे हाथ से गिर गया। मैंने कहा, ओहो! यह क्या हो रहा है ?जल्दी-जल्दी में मैंने वह साफ किया।इस के बाद जब मैंनें कोल्ड ड्रिंक को खोला तो कोल्ड ड्रिंक बोतल में भाप बनी हुई थी, वह थोड़ी सी रसोई के शैल्फ के ऊपर गिर गई और फिर मुझे वहाँ पर सफाई करनी पड़ गई। मैं सोच रही थी, अरे, बाबा! आज हो क्या रहा है? शायद यह मेरी जल्दबाजी थी या उत्सुकता थी कि उनके सामने घर को थोड़ा सलीके से पेश किया जाए। घर की हर चीज सलीके से रखी दिखनी चाहिए। उन्होंने मुझे कहा कि कोई बात नहीं। सब घरों में ऐसे ही सामान बिखरा रहता है आप इतनी टेंशन नहीं लीजिए। लेकिन आपने यह जो पौधे मेज़ पर सजाकर रखे हुए हैं यह बहुत ही अच्छे से लग रहे हैं। बड़ी अच्छी तरह से अपने पौधों की देखभाल की हुई है, तब सुनकर अच्छा लगा कि चलो कोई चीज तो घर पर व्यवस्थित ढंग से रखी हुई है। काफी समय तक चाय के दौर के साथ साहित्यिक बातचीत होती रही जिसमें पुस्तकों की चर्चा, साहित्यिक विचार चर्चा ,प्रकाशन की जिम्मेदारी एवं समस्याएं आदि के बारे में वार्तालाप होता रहा ।इतना ही नहीं, पुस्तकों के प्रति लोगों के कम अधिक होते हुए रुझान के ऊपर , पुस्तकों को पढ़ने की रुचि के संबंध में भी बातचीत होती रही और समय का पता ही नहीं चला कि कब समय बीत गया। कहते हैं सकारात्मक ऊर्जा से दिन का आरंभ हो तो सारा दिन सकारात्मक ऊर्जा ही भरी रहती है।
क्रमशः
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