मेरी तन्हाई--तीसरा पहर ( भाग-19)डॉ.पूर्णिमा राय, पंजाब

मेरी तन्हाई--तीसरा पहर  ( भाग-19)
डॉ.पूर्णिमा राय, पंजाब

बिजली के गुल होने की असुविधा हर किसी को खलती है पर तब अधिक खलती है जब समय रात का हो। रात के समय बिजली कभी आ रही थी। कभी जा रही थी ।कभी एयर कंडीशनर ऑन होता था, कभी  बंद हो जाता था। इसी चक्कर में कभी स्विच ऑन हो रहा था, कभी स्विच ऑफ कर रही थी। यह सोचकर कि कहीं लाइट एकदम से अधिक आ गई तो कोई नुक्सान न हो जाए ।बस ऐसे ही करते-करते रात का तीसरा पहर आ गया था। कुछ समय बाद पंखे की हवा से ही धीरे धीरे नींद आ गई। सुबह जब उठी तो एक कप चाय के प्याले की तलब हुई । वैसे दिनचर्या में मैं सुबह की चाय अधिकतर नहीं लेती हूँ।उससे पहले शीशे के पास गई और अपने आप को देखकर कहने लगी, मैं ठीक हूँ, मैं स्वस्थ हूँ, मुझे कुछ नहीं हुआ है। पर रात को गर्दन के पास कुछ हल्का सा खराश हो रहा था। शायद किसी चींटी ने काट लिया होगा, पर जब बिस्तर पर देखा तो कुछ भी नहीं था।  उसका हल्का-हल्का निशान गर्दन पर नजर आ रहा था, फिर सोचा कोई बात नहीं यह तो मामूली सी खराश है, ठीक हो जाएगी। फिर किचन में जाती हूँ चाय बनाने के लिये। चाय को बनाकर प्याले में डालती हूँ।तभी दिमाग में आता है कि अपने बच्चों को देख लूँ। हां ,हां ,ठीक सुना आपने! अपने बच्चों को देख लूँ। खिड़की से बाहर देखती हूँ।बालकनी का दरवाजा खोलती हूँ तो सूरज की रोशनी के साथ हरे पत्तों पर बिखर रही चमक आँखों को आकर्षित करती है। एक प्यारा सा मीठा सा एहसास मन को होता है। एकाएक पौधों की मिट्टी की तरफ ध्यान जाता है ,देखती हूँ वह सूख चुकी है ।ऐसा लगता है जैसे उनको प्यास लगी है। मन कहता है कि अपने भीतर चाय का प्याला करने की बजाय मुझे किसी की प्यास बुझानी है। चाय को छोड़कर बस कुछ समय अपने बच्चों की देखभाल में लग जाती हूँ। थोड़ी-थोड़ी गर्मी का अनुभव भी हो रहा था क्योंकि मौसम अभी गरम ही है ,तपिश हो रही है । थोड़ी देर बाद मैं  चाय का प्याला लेकर कुछ देर बैठती हूँ तो जहन में यही बात घूम रही है कि थोड़ी सी गर्मी भी शरीर को बर्दाश्त नहीं हो रही है। वह लोग कैसे रहते हैं ,वह लोग कैसे काम करते हैं जो दिन भर धूप में रहते हैं। स्कूल शिक्षक भी स्कूल के कमरे में बैठकर एक छत के नीचे बैठकर बच्चों को पढ़ाते हैं , एक वकील भी अपने चेंबर में बैठकर अपने केस का कार्य करता है ।एक डॉक्टर भी अस्पताल की छत के अंदर ही मरीजों का इलाज करता है ।दुकानदार भी दुकान के भीतर बैठकर किसी भी तरह गर्मी से बचने का उपाय करकेदुकान चलाते हैं।  पर सोचती हूँ जो लोग सड़कों पर रेहडी लगाकर काम करते हैं क्या उनको गर्मी नहीं लगती ?जो लोग बलिंकिट ,जोमेटो या अन्य आनलाइन प्लेटफार्म से  आर्डर लेकर आते हैं, लोगों की सुख-सुविधाओं को उनके घर तक लेकर आते हैं ।ठीक है उनको इस कार्य के लिए वेतन मिलता है, इसलिए वह कार्य करते हैं। क्या वह पत्थर के हैं जो उनको गर्मी नहीं लगती ।हमारी सुख- सुविधाओं को पूरा करने के लिए दिन भर सड़कों पर ,बाजारों में एवं गलियों में घूमते रहते हैं ।यही सोचती हूँ कि क्या उन लोगों को गर्मी नहीं लगती। वह लोग अपने स्वास्थ्य का अधिक ध्यान रखने के स्थान पर  दूसरों की सुख सुविधाओं की पूर्ति हेतु जीवनयापन करते हैं। दूसरों की जरूरत को पूरा करने के लिए दर-दर भटकते रहते हैं ।जो लोग हमारे घरों में साफ- सफाई का काम करने आते हैं, उनको भी तो गर्मी लगती होगी। जो गलियों में हांक लगाकर सामान बेचने आते हैं उनको भी गर्मी लगती है। कहने का भाव है कि यह ठीक है जिंदगी में अपने कर्मों के हिसाब से हमें सुख-सुविधा मिलती है। हम इस कर्म चक्र के आधार पर जिंदगी व्यतीत करती है। जितनी शिक्षा हमने ग्रहण की है, इस शिक्षा के आधार पर ही कार्य का चुनाव किया जाता है पर इसका मतलब यह तो नहीं है कि सूर्य की धूप , सन्ध्या की छाया और  रात की चांदनी सबके लिए अलग-अलग होती है। ऐसा नहीं है कुदरत सबके लिए ही एक समान है पर अगर हम इंसान भी कुदरत की भांति समरूपता का संदेश देना आरंभ करें,  समरसता का संदेश दें  व एकरूपता की बात करना शुरू कर दें तो मुझे लगता है जिंदगी बदल सकती है। यहाँ यह बात रखकर यही कहने का प्रयास कर रही हूँ कि कोई भी कार्य छोटा-बड़ा नहीं है। हम अगर किसी के दुख दर्द को कम नहीं कर सकते तो हम किसी को दुखी करने का भी साधन न बने।हम किसी की सुख-सुविधाओं में वृद्धि नहीं कर सकते तो हमें किसी के दुखों को भी बढ़ाना नहीं चाहिए। हम अगर किसी के लिए कुछ नहीं कर सकते तो हम अपने व्यवहार से उनके प्रति आदर सत्कार और सम्मान दिखा सकते हैं।अपनी सुख-सुविधाओं से तनिक थोड़ा ऊपर उठकर अपने सामान्य जीवन से थोड़ा ऊपर उठकर जो लोग जिंदगी जीते हैं उनके लिए जिंदगी जीने का और खुशहाल जिंदगी जीने के अवसर खुद-ब-खुद सामने आने शुरू हो जाते हैं।क्रमश:

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    1. प्रतिक्रिया हेतु आभार आदरणीय 🙏

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