मेरी तन्हाई --इच्छाएं (भाग-2)

मेरी तन्हाई --इच्छाएं (भाग-2)
डॉ.पूर्णिमा राय, पंजाब

पानी की टंकी भर गई है !कृपया अपनी मोटर बंद कर दीजिए! बार-बार यह ध्वनि कानों में गूंजती रहती है, पर जिनके घर पर यह घंटी बज रही है,, उनको एहसास ही नहीं है कि कितना पानी व्यर्थ जा रहा है! पर यह सब सुनकर मैं हमेशा अलर्ट हो जाती हूँ कि कहीं मेरे घर की टंकी से पानी बेकार तो नहीं जा रहा है ।दूसरों को समझाना मुश्किल है ,पर नामुमकिन नहीं है ।यही सोचा कि जब भी वक्त मिलेगा तो मैं अपनी रचनाओं से लोगों को प्रेरित करूँगी कि पानी को व्यर्थ मत करें, जितना पानी की आवश्यकता हो, उतना ही पानी का प्रयोग करें। इंसान है भूल तो हो ही जाती है ।पहले पहले कई बार मोटर चलाकर मैं भी भूल जाती थी कि पानी की टंकी भर चुकी है पर अब धीरे-धीरे नियम बन गया है कि जब तक मोटर को घड़ी देखकर चलाती हूँ और उसको बंद कर देती हूँ। अगर हम अपनी जिंदगी के नियम बना लें तो जिंदगी जीना आसान हो जाता है। यह ठीक है कि हर नियम के अनुसार हम जीवनयापन नहीं कर सकते पर जहाँ नियमों का इस्तेमाल किया जा सकता है, हमें वहाँ नियमों का पालन करना चाहिए। बस आज यही सोच रही थी कि खिड़की से बाहर झांका तो कबूतरों का एक जोड़ा बहुत ही प्यारा मस्ती में लगा हुआ है, उनको एहसास ही नहीं है कि बाहर धूप है या उनके पास पानी का प्याला भी नहीं है, खाने के लिए चुग्गा भी नहीं है ,पर वह अपनी ही मस्ती में एक दूसरे के साथ लगे हुए हैं। एक दूसरे के दर्द को बांट रहे हैं। एक दूसरे को प्यार का एहसास करवा रहे हैं। अगर उनमें थोड़ी सी नोंक-झोंक भी हो रही है तो दोनों में से कोई एक दूसरे को छोड़कर उड़ नहीं रहा है। एकटक उनको निहारती हुई यही सोच रही हूँ कि उन्होंने कुछ पलों में चंद लम्हों में  पूरी जिंदगी जी ली है और हम इंसान होकर अभी भी अधूरेपन का एहसास कर रहें हैं! कुछ ना कुछ पाने की लालसाएं, इच्छाएं ,तृष्णाएं लेकर मन भटक रहा है! क्रमशः 

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