मेरी तन्हाई--प्रकृति (भाग-22)डॉ.पूर्णिमा राय, पंजाब

मेरी तन्हाई--प्रकृति (भाग-22)
डॉ.पूर्णिमा राय, पंजाब

प्रकृति में सकारात्मक परिवर्तन लाने की क्षमता
है। पंचतत्व निर्मित मानव भी प्रकृति का ही अंग है। प्रकृति और मानव एक दूसरे के पूरक हैं। जून के महीने में बारिश का आना बदलते हुए मौसम और वातावरण की मुँह बोलती तस्वीर है।जैसे ही बारिश आती है तो मन में विचार आता है कि बारिश में तन भीगे पर मन भीगना नहीं चाहिए। इस भाव और विचार का अभिप्राय हर एक व्यक्ति अपने नजरिए से देखेगा। जिसके मन की अवस्था दूसरों के प्रति चिंतित भावना की है, दूसरों के लिए वह सोच रहा है तो वह सोचेगा कहीं इस बारिश से किसी ऐसे व्यक्ति का नुकसान ना हो जाए जिसको बाद में मुश्किल का सामना करना पड़े। जिस व्यक्ति की अवस्था खुश है, खुशहाल जीवन है ,जिसके पास प्यार करने वाले लोग हैं ,वह व्यक्ति यही सोचेगा कि मैं अपने किसी प्रिय जन के साथ इस बारिश का आनंद लूँ। यह अपनी-अपने मन की अवस्थाओं पर निर्भर करता है कि हम किसी भी बदलाव को किस प्रकार स्वीकार करते हैं।प्रकृति के साथ खिलवाड़ होता है तो मानव का भस्म होना और इस सृष्टि का विकास अवरूद्ध हो जाना संभव है।अगर मानव के भीतर से भी प्रकृति के किसी भी अंश की कमी हो जाये तो भी मानव का विनाश होते देर नहीं लगती है।इसीलिए प्रकृति और मानव में संतुलन होना आवश्यक है। लेकिन मनुष्य आज की भागदौड़ की जिंदगी में इतना व्यस्त हो चुका है उसे प्रकृति को महसूस करने के लिए अपने व्यस्त समय से समय निकालकर और धन खर्च करके प्रकृति की गोद में विश्राम करने के लिए, शांत सौम्य  वातावरण की तलाश में ,अधिक लंबा सफर करके ऐसे स्थान पर घूमने जाना पड़ता है ,जहाँ वह महज कुछ दिन ही रह पाता है। कुछ दिन के ही आनंद में विभोर मानव यह सोचता है कि वह बहुत प्रकृति प्रेमी है पर ऐसा नहीं है। कुछ दिन आनंद में व्यतीत करने के पश्चात साल के बाकी के दिन हम इस भागदौड़ में व्यतीत करते हैं जिस वजह से हम फिर असंतुलित जीवन जीना शुरु कर देते हैं। संतुलित जीवन के लिए हमें जरूरी है कि हम जहाँ भी रह रहे हैं, हमें वहां पर कुदरत का नजारा , सामीप्य प्राप्त हो सके, हमें  अपने आसपास ऐसे  वातावरण का निर्माण करना होगा जिससे हमारे स्वास्थ्य पर भी अच्छा असर पड़ेगा। भ्रमण करना, घूमने जाना स्वास्थ्य के लिए अच्छा है।एक निश्चित स्थान पर लगतार रहने से बोरियत और ऊब का एहसास भी होने लगता है। इस वजह से भी अपने मन को प्रसन्नचित करने के लिए हम अन्य स्थानों पर घूमने जाना पसंद करते हैं पर अगर हम प्रकृति प्रेमी हैं तो हमें अपने आसपास की आबो-हवा को ही इस तरह का बनाना होगा। उदाहरणत:जहाँ पर हमें एक ए.सी  से काम चल सके वहाँ एक ही घर में चार-चार ए.सी का इस्तेमाल करना बेकार है, कुदरत के विरुद्ध है। लेकिन हम इंसान हैं हम सिर्फ स्वयं का ही सोचते हैं। अगर हम अपने आसपास पौधे लगाएंगे तो हम अपने आसपास के वातावरण को भी शुद्ध कर रहे हैं। हम अपने आसपास के माहौल को भी अच्छा करने का प्रयास कर रहे हैं कोई अगर सुधार नहीं करता है तो हमें स्वयं से ही सुधार करने का आरंभ करना होगा और प्रकृति से प्रेम करना मात्र कहना ही नहीं बल्कि उसे व्यवहार में भी लाना आवश्यक है। 

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