मेरी तन्हाई--प्यार (भाग-23)डॉ.पूर्णिमा राय, पंजाब
मेरी तन्हाई--प्यार (भाग-23)
डॉ.पूर्णिमा राय, पंजाब
प्यार एक ऐसा एहसास है जिसे ना तो शब्दों में ब्यां किया जा सकता है, ना ही इसे किसी बंदिश में बांधा जा सकता है ।शक के दायरे से यह बहुत दूर होता है जिसे प्यार का सही मायने समझ आ जाए वही किसी को प्यार कर सकता है।किसी को प्यार करो पर मोह ना करो।प्यार सब कुछ त्यागना जानता है और मोह में इंसान सिर्फ पाने की चाहत रखता है।
किसी की अत्यधिक परवाह करना प्यार के अंतर्गत आता है।किसी को जुनून की हद से चाहना यह भी प्यार है। किसी को सिर्फ अपना बनाने की जिद्द करना और उसे हासिल ना कर पाने की चाहत में अपने आप को नुकसान पहुँचाना या जिसको हम प्रेम करते हैं उसको नुकसान पहुँचाना यह प्यार नहीं है। यह महज एक जुनून होता है। प्यार तो निस्वार्थ है जिसमें किसी भी स्वार्थ की भावना की गुंजाइश नहीं होती। किसी की छोटी-छोटी जरूरत को पूरा करना, किसी के लिए हर वक्त जरूरत पड़ने पर साथ देना यह प्यार का अभिन्न अंग है पर बदले में कुछ हासिल करने की उम्मीद प्यार नहीं महज़ मोह है। इसी मोह को प्यार का नाम दे देना आज के समय में अत्यधिक प्रचलन में आ गया है। तभी तो प्रतिदिन हमें अखबारों की सुर्खियों में ,सोशल मीडिया पर आत्महत्या की, किसी को प्रेम की वजह से मार देने की घटनाएं आम देखने को मिल जाती हैं।प्रेम की पराकाष्ठा का अंदाजा राधा-कृष्ण के प्रेम में लगाया जा सकता है ।हीर रांझा, लैला मजनूं, सोनी महिवाल , रोमियो जूलियट इनके किस्सों में हम प्रेम की पराकाष्ठा को देखते हैं। मैं यह नहीं कहती कि अगर प्रेमी प्रेमिका का मिलन हो जाता है तो वह प्रेम ,प्रेम नहीं है और जब उनका मिलन नहीं होता तो वह प्रेम की पराकाष्ठा है। ऐसा नहीं कह रही हूँ। यह उदाहरण इसीलिए दिया गया है कि प्रेम में सर्वस्व समर्पित करके भी अगर हम उस प्रेम को न पाकर भी जिंदा है तो हम असल मायने में प्रेम करते हैं हम उस प्रेम की भावना को अपने जीवन जीने का एक स्रोत मान सकते हैं। जैसे मीरांबाई ने श्री कृष्ण के प्रेम में उनको अपनी भक्ति का आधार मान लिया और अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया। प्रेम तन का मिलन नहीं होता मन का भी मिलन है।पर असल में प्रेम को सिर्फ शादी के बंधन तक सीमित कर लिया जाता है।जिस वजह से प्रेम विवाह होने के पश्चात भी लोग आजीवन साथ नहीं रह पाते हैं। दरअसल प्रेम की मंजिल शादी नहीं होती। प्रेम तब तक जीवित रहता है जब तक इंसान जीवित है और जिसके दिल में प्रेम की सच्चाई होती है वह इंसान दुनिया को खूबसूरत नजरों से देखत है ।उसको हर कण-कण में अच्छाई नजर आती है। अगर कोई उसके साथ बुराई भी करता है तो भी उसे लगता है कि शायद जो हो रहा है अच्छा ही हो रहा है । प्रेम श्रृंगार रस के संयोग और वियोग दोनों पक्षों के साथ जुड़ा हुआ है। प्रेम भक्ति का आधार भी है।
संत कबीर जी के दोहे में प्रेम की भावना का बहुत खूबसूरत वर्णन किया गया है।
प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय।
राजा-परजा जेहि रुचै, सीस देइ लै जाय॥
उनका मानना है कि प्रेम समर्पण भावना से प्राप्त होता है। प्रेम किसी भी दुकान से खरीदा नहीं जा सकता है प्रेम एक आंतरिक भावना है जिसे समर्पण से ही प्राप्त किया जा सकता है और समर्पण भावना से ही जीवित रखा जा सकता है।
प्रेम शक्ति का साक्षात् प्रमाण है है। परम भक्त हनुमान जी की श्री राम के प्रति सेव्य भावना दरअसल उनकी प्रभु भक्ति की चरम सीमा है। प्रभु श्री राम के प्रति सच्चे प्रेम का ही परिचायक है। सच्चे भक्तों का सच्चा प्रेम ही है , तभी तो वह दुनिया में आज भी पूजनीय है।सत्यम् शिवम् और सुंदरम् इन तीनों का सुमेल प्रेम है। क्रमशः
डॉ.पूर्णिमा राय, पंजाब
प्यार एक ऐसा एहसास है जिसे ना तो शब्दों में ब्यां किया जा सकता है, ना ही इसे किसी बंदिश में बांधा जा सकता है ।शक के दायरे से यह बहुत दूर होता है जिसे प्यार का सही मायने समझ आ जाए वही किसी को प्यार कर सकता है।किसी को प्यार करो पर मोह ना करो।प्यार सब कुछ त्यागना जानता है और मोह में इंसान सिर्फ पाने की चाहत रखता है।
किसी की अत्यधिक परवाह करना प्यार के अंतर्गत आता है।किसी को जुनून की हद से चाहना यह भी प्यार है। किसी को सिर्फ अपना बनाने की जिद्द करना और उसे हासिल ना कर पाने की चाहत में अपने आप को नुकसान पहुँचाना या जिसको हम प्रेम करते हैं उसको नुकसान पहुँचाना यह प्यार नहीं है। यह महज एक जुनून होता है। प्यार तो निस्वार्थ है जिसमें किसी भी स्वार्थ की भावना की गुंजाइश नहीं होती। किसी की छोटी-छोटी जरूरत को पूरा करना, किसी के लिए हर वक्त जरूरत पड़ने पर साथ देना यह प्यार का अभिन्न अंग है पर बदले में कुछ हासिल करने की उम्मीद प्यार नहीं महज़ मोह है। इसी मोह को प्यार का नाम दे देना आज के समय में अत्यधिक प्रचलन में आ गया है। तभी तो प्रतिदिन हमें अखबारों की सुर्खियों में ,सोशल मीडिया पर आत्महत्या की, किसी को प्रेम की वजह से मार देने की घटनाएं आम देखने को मिल जाती हैं।प्रेम की पराकाष्ठा का अंदाजा राधा-कृष्ण के प्रेम में लगाया जा सकता है ।हीर रांझा, लैला मजनूं, सोनी महिवाल , रोमियो जूलियट इनके किस्सों में हम प्रेम की पराकाष्ठा को देखते हैं। मैं यह नहीं कहती कि अगर प्रेमी प्रेमिका का मिलन हो जाता है तो वह प्रेम ,प्रेम नहीं है और जब उनका मिलन नहीं होता तो वह प्रेम की पराकाष्ठा है। ऐसा नहीं कह रही हूँ। यह उदाहरण इसीलिए दिया गया है कि प्रेम में सर्वस्व समर्पित करके भी अगर हम उस प्रेम को न पाकर भी जिंदा है तो हम असल मायने में प्रेम करते हैं हम उस प्रेम की भावना को अपने जीवन जीने का एक स्रोत मान सकते हैं। जैसे मीरांबाई ने श्री कृष्ण के प्रेम में उनको अपनी भक्ति का आधार मान लिया और अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया। प्रेम तन का मिलन नहीं होता मन का भी मिलन है।पर असल में प्रेम को सिर्फ शादी के बंधन तक सीमित कर लिया जाता है।जिस वजह से प्रेम विवाह होने के पश्चात भी लोग आजीवन साथ नहीं रह पाते हैं। दरअसल प्रेम की मंजिल शादी नहीं होती। प्रेम तब तक जीवित रहता है जब तक इंसान जीवित है और जिसके दिल में प्रेम की सच्चाई होती है वह इंसान दुनिया को खूबसूरत नजरों से देखत है ।उसको हर कण-कण में अच्छाई नजर आती है। अगर कोई उसके साथ बुराई भी करता है तो भी उसे लगता है कि शायद जो हो रहा है अच्छा ही हो रहा है । प्रेम श्रृंगार रस के संयोग और वियोग दोनों पक्षों के साथ जुड़ा हुआ है। प्रेम भक्ति का आधार भी है।
संत कबीर जी के दोहे में प्रेम की भावना का बहुत खूबसूरत वर्णन किया गया है।
प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय।
राजा-परजा जेहि रुचै, सीस देइ लै जाय॥
उनका मानना है कि प्रेम समर्पण भावना से प्राप्त होता है। प्रेम किसी भी दुकान से खरीदा नहीं जा सकता है प्रेम एक आंतरिक भावना है जिसे समर्पण से ही प्राप्त किया जा सकता है और समर्पण भावना से ही जीवित रखा जा सकता है।
प्रेम शक्ति का साक्षात् प्रमाण है है। परम भक्त हनुमान जी की श्री राम के प्रति सेव्य भावना दरअसल उनकी प्रभु भक्ति की चरम सीमा है। प्रभु श्री राम के प्रति सच्चे प्रेम का ही परिचायक है। सच्चे भक्तों का सच्चा प्रेम ही है , तभी तो वह दुनिया में आज भी पूजनीय है।सत्यम् शिवम् और सुंदरम् इन तीनों का सुमेल प्रेम है। क्रमशः
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