मेरी तन्हाई: संकेत भाषा (भाग-25)डॉ.पूर्णिमा राय, पंजाब

मेरी तन्हाई: संकेत भाषा (भाग-25)
डॉ.पूर्णिमा राय, पंजाब

दोस्तो! हमारी भारतीय परंपरा एवं सांस्कृतिक विरासत बहुत विशाल एवं संपन्न है ।भारतीय परंपराओं को जीवित रखने के लिए हमें बार-बार इन चीजों को दोहराने की आवश्यकता नहीं होती। भारतीय विरासत जिंदा रहे, यही दुआएं रहती हैं।उसके लिए हमें जैसे-जैसे समय बीत रहा है वैसे-वैसे हमें भावी पीढ़ी को उसके प्रति सचेत और जागरूक करने की आवश्यकता होती है। हमारे पूर्वजों ने तथा बड़े-बुजुर्गों ने जो देखा है ,उनके जो अनुभव है वह एक तरह की भारतीय विरासत और परंपरा ही है ।अगर हम अपने बड़े-बुजुर्गों के बताए हुए रास्तों को अपनाकर ही आज जीवनयापन करते हैं तो आज के समय में इस वातावरण के अनुसार जीवन जीना मुश्किल हो जाता है। इसके लिए आवश्यक है कि हमें अपने बुजुर्गों के बताए हुए अनुभवों को एवं अपनी विरासत को साथ लेकर चलना होगा। पारंपरिक जीवन को वर्तमान के साथ तालमेल बिठाकर जिंदगी जीना आवश्यक है। यह तभी हो सकता है जब हमारे भीतर सुनने की क्षमता हो, हमारे भीतर ठहराव हो, हम अपने भीतर से मैं-मेरी की भावना को समाप्त कर पाएं, तभी हम आगे आज के समय में सुखी और खुशहाल जीवन यापन कर सकते हैं। किसी भी चीज की अधिकता और न्यूनता हमेशा ही नुक्सानदायक होती है ।अत्यधिक बारिश का आ जाना एवं  अत्यधिक धूप निकलना दोनों ही सही नहीं है।इसीलिए बार-बार कहा जाता है कि जिंदगी समभाव में रहकर बितानी चाहिए ।आज के जीवन में आपने देखा होगा कि आजकल ब्लड प्रेशर की समस्याएं बहुत अधिक हो गई हैं। एक पल में बीपी हाई हो जाता है और दूसरे पल में बीपी डाऊन चला जाता है ।व्यक्ति को खुद भी पता नहीं चलता कि उसे क्या हो रहा है ।साइलेंट ब्लड प्रेशर की समस्या और अधिक चिंता का विषय बन चुकी है। कारण है - तनाव ग्रस्त जीवन और अधिक भाग-दौड़। अब यहां यह सवाल उठता है कि क्या अपने जीवन की सुख-सुविधाओं को पूरा करने के लिए भाग दौड़ करना नहीं चाहिए?अवश्य यह भाग दौड़ भी जरूरी है!फिर हम दोबारा सोचते हैं कि आज के वातावरण के अनुसार जीवन जी रहे हैं ।फिर भी हम क्यों नहीं बीमारियों का मुकाबला कर पा रहे हैं।  हमें फिर  प्राकृतिक गोद पसंद आती है। भारतीय परंपरा , भारतीय विरासत, भारतीय औषधियों से उपचार करने की ओर जाने  को  मन आतुर हो जाता हैं।हमें  उस संजीवनी बूटी की याद आती हैं जिसे अंजनी सुत श्री हनुमान जी ने लक्ष्मण जी को मूर्छित अवस्था से बाहर निकालने के लिए उपयोग किया था ।पर आज के समय में वह संजीवनी बूटी क्या है ?आज के समय में संजीवनी बूटी है--हमारा समभाव  और समरसता में रहना । यह कैसे उचित हो सकता है ।इसके लिए आवश्यक है कि हम बड़े-बुजुर्गों के अनुभवों के साथ-साथ आज के तकनीकी युग के साथ सामंजस्य बिठाकर जिंदगी व्यतीत करें। कहना बहुत आसान है और करना बहुत मुश्किल। पर जो मैं कह रही हूँ शायद वह हम कर सकते हैं। पर हम लोग करना नहीं चाहते हैं ।हमें पता है कि हमारी भारतीय परंपरा में बहुत सी ऐसी चीज हैं जो हमें सुखी और खुशहाल जीवन दे सकती हैं पर हम आज ए-आई के जमाने में भी पीछे नहीं रहना चाहते हैं क्योंकि वक्त की यही मांग है।इसके लिये बस हमें अपने समय का ध्यान रखना होगा ।अनुशासित जीवन व्यतीत करना होगा और प्रकृति का अधिक से अधिक सहारा लेना होगा ।आजकल आप देखते हैं कि एक समय था जब लोग किसी की बात को सहन कर लेते थे ।चुप करके सुन लेते थे। मौन व एकांत का बहुत अधिक महत्वपूर्ण स्थान था ।पर आज कोई कुछ कहता है तो उलटवार में उसी वक्त उसका जवाब दे देते हैं, परिणाम की किसी को भी फिक्र नहीं होती है। पहले इशारों में ही बात हो जाती थी। संकेत में बात हो जाती थी और संकेत से ही लोग समझ जाते थे कि अन्य व्यक्ति क्या कहना चाह रहा है।  आज हम ऊँची-ऊँची बोलकर, चिल्ला कर भी अपनी बातों को लोगों तक नहीं पहुँचा पा रहे। कारण यही है कि बोलने वाले बहुत है, पर सुनने वाले बहुत कम है। और अगर कहीं सुनने वाले हैं भी तो वह इतने अधिक सुनने वाले हैं कि उनके बोलने की भावना ही उनके भीतर से खत्म हो चुकी है। जो कि बहुत ही गलत है । अभिप्राय यही है कि हमें स्वयं का मान-सम्मान बनाए रखने के साथ-साथ दूसरों के प्रति आदर सत्कार भावना प्रकट करने के लिए सांकेतिक भाषा का इस्तेमाल करना आना चाहिए । पुरातन समय में जब सुबह-सुबह चिड़िया  चीं-चीं करती थी ,कोयल कूकती थी, मुर्गा भांग देता था तो सुबह हो जाती थी और आजकल आप सबको पता ही है कि अलार्म बजने के पश्चात भी अलार्म को बार-बार बंद किया जाता है और उठने में असुविधा होती है ।यह तो महज़ एक छोटी सी बात मैंने रखी है । सांकेतिक भाषा एक तरह से शारीरिक मुद्राओं का प्रकटाव है। अगर हम अपनी बात रखने के साथ शारीरिक मुद्राओं का इस्तेमाल करते हैं तो हमारी बात के कहने का वजन और भी अधिक बढ़ जाता है । उदाहरणतः  जब आप व्हाट्सएप पर अलग-अलग तरह के विचार दूसरों के समक्ष प्रकट करते हैं और जब आप उसमें दिये हुए इमोजी का इस्तेमाल करते हैं तो आपकी भीतरी भावनाओं का अनुमान अन्य व्यक्ति को हो जाता है । मैं मानती हूँ कि व्हाट्सएप मैसेज में इमोजी के माध्यम से रखी गई भावनाओं का 100% पता तो नहीं चलता है पर फिर भी 50% आप दूसरे के मन की भावना का आकलन कर लेते हैं। संकेत की भाषा में हमें  मानवीय गुणों की धारणा को स्पष्ट समझना होगा।  फोन से किसी से हेलो कहना, धन्यवाद का भाव प्रकट करना,  गले मिलने की भावना, हाथ मिलाना ,फिर मिलेंगे ,समर्थन करना ,आप सही हैं ऐसा अहसास करवाना, आदि को अगर हम सिर्फ शब्दों का ही जामा पहनाते हैं तो उससे हमारी बात का वज़न अधिक नहीं बढ़ता है और जब हम अपनी शारीरिक मुद्राओं के साथ अपनी बात रखते हैं तो दूसरों को एहसास होता है --आपके शिष्टाचारी होने, आपके व्यक्तित्व और आपके अंतर्मन की सहजता और सरलता का!! इसीलिए भारतीय संकेत भाषा भारतीय परंपराओं को जीवित रखने का एक स्रोत है। मुझे यह भी लगता है कि यह संकेत ऐसी मौन भाषा है कि इसके लिए अगर हम कुछ ना भी बोलेंगे तो भी समझने वाला हमारे संकेतों के माध्यम से हमारे मन को पढ़ लेगा। अपने निम्न कथन से अपनी बात को यहीं विराम देती हूँ--
गहरे मौन में भी एक सुकून होता है
महसूस करके देखिये!
प्यार की गहराई में एक जुनून होता है
मौन रहकर सोचिये!!

क्रमशः 

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