मेरी तन्हाई--गहरी नींद (भाग-26)डॉ.पूर्णिमा राय, पंजाब

मेरी तन्हाई--गहरी नींद (भाग-26)
डॉ.पूर्णिमा राय, पंजाब


रात को गहरी नींद में सोने से पहले सुबह की योजना के बारे में जानने की इच्छा लिए हुए अचेत मन सो जाता है ।सुबह की योजना से बेखबर मन यही सोचता है कि अब शायद कुछ नहीं हो सकता ।अब कल जो होगा देखा जाएगा। बस यही सोचकर हमारा मन रात को गहन निद्रा में सो जाता है। एक समय था ।जब हम लोग खत लिखते थे, तार भेजते थे तो दो-तीन दिन बाद वह खत मिलता था ।कई बार वह काफी-काफी दिनों बाद मिलता था और हमें सूचना मिलती थी। हमें फिर पता चलता था कि कोई प्रोग्राम होने जा रहा है। आजकल ऑनलाइन का जमाना है। व्हाट्सएप का जमाना आ गया है तो व्हाट्सएप के माध्यम से हमें योजनाओं को बनाने और उन्हें लागू करने में बिल्कुल भी ज्यादा समय नहीं लगता है और सूचना शीघ्र ही भेज दी जाती है। ऐसे ही रात को गहन निद्रा में सोई हुई मैं यह सोचती रही कि कल का कोई प्रोग्राम शायद नहीं होगा। बस इतना सा पता है कि एक मीटिंग होनी है तो मीटिंग का कोई स्थान पता न होने की वजह से बेचैन मन गहन निद्रा में सो जाता है ।आप समझ सकते हैं जब इंसान सो जाता है तो फिर भूल जाता है कि सुबह जो होगा देखा जाएगा । मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ।वैसे भी जब हम अपने अतिरिक्त समय से समय निकालते हैं तो हमें इस बात की चिंता अधिक नहीं होती ,पर उस वक्त हमें चिंता अधिक हो जाती है जब हमें पता चलता है कि  हमसे कुछ छूट गया है। मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। सुबह के समय मुझे मेरे साथी दोस्त का फोन आना शुरू हो गया। पर मुझे पता ही नहीं चल रहा था क्योंकि मैं सोई हुई थी ।कुछ थकावट सी लग रही थी। कुछ तबीयत हल्की-फुल्की ठीक नहीं लग रही थी । जब उठकर फोन देखा तो जल्दी से मैसेज देखा। मैसेज करके न पहुँचने पर क्षमा मांगी। फिर कॉल करके पूछा कि क्या करें ,क्या ना करें। तब फिर सोचा इतने में एक और समूह में एक मैसेज देख लिया। पहले तो  प्रोग्राम के समय और स्थान का सटीक पता न होने का मैसेज न देख पाने के कारण और तबीयत ठीक ना होने की वजह से नहीं जा पाई थी ।पर जब दूसरा मैसेज आया तो वह वक्त अनुकूल था जाने के लिए। अब फिर मन बहाने बनाने लग गया कि चलो !रहने देते हैं ।अब वहाँ जाने का क्या फायदा होगा। बहुत से लोग वहाँ पर पहुँच गए होंगे। वैसे भी मैं वहाँ जाकर क्या कर सकती हूँ? पर फिर मन से रहा ना गया। जैसे कहते हैं किसी सत्संग में इंसान जब नहीं जा पाता है तो उसका मन उस सत्संग की ओर ही लगा रहता है कि वहाँ क्या हो रहा होगा। मुझे चले जाना चाहिए ।आज मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ। मैं दुविधा में ही रही कि अब वहाँ जाऊँ कि ना जाऊँ। इसी दौरान व्हाट्सएप पर शिक्षक और छात्राओं द्वारा प्रोग्राम को बेहतरीन बनाने के लिए कार्य करते हुए तस्वीरों पर नजर पड़ी तो मन को अति प्रसन्नता हुई कि कैसे सभी कार्य अच्छे से कर रहे हैं। कैसे सब अपना-अपना बेहतरीन देने का प्रयास कर रहे हैं। मैंने प्रोग्राम के प्रबंधक महोदय से फोन पर बात की तो उन्होंने कहा कि हमें तो यहाँ पर रात के आठ-नौ बज सकते हैं। सभी यहाँ पर हैं तो आप चाहे शाम तक आ जाएँ। अन्यथा आप कल प्रोग्राम के दिन 7:00 बजे पहुँच जाए।उन छात्राओं- शिक्षकों से मुझे भी थोड़ी सी प्रेरणा मिली और फिर मन बना लिया कि मुझे वहाँ पर जाना चाहिए क्योंकि अगर मेरा कार्य वहाँ चाहे थोड़ा सा ही हो पर अगर मैं उस टीम का हिस्सा हूँ तो मुझे वहाँ पर पहुँचना जरूरी है। चाहे मैं स्वस्थ हूँ चाहे अस्वस्थ हूँ। मेरे मन में यह विचार आया कि जो लोग सुबह 8:00 बजे के उस स्थान पर हैं, पता नहीं उन्होंने कुछ खाया होगा या नहीं,बस भावनात्मक स्तर पर मैं वहाँ पर उपस्थित सभी लोगों से घर पर रहते हुए भी जुड़ गई और कुछ थोड़ा सा खाने-पीने की वस्तुएं जो कि ना मात्र ही थी। अपने साथ वहाँ ले गई और दोपहर के करीब मैं वहाँ पर पहुँच गई। शिक्षा विभाग के प्रतिष्ठित अधिकारी सभी वहाँ पर मौजूद थे। उनका व्यक्तित्व ,कार्य के प्रति निष्ठा ,लगन और प्रोग्राम को सफल बनाने की शुभेच्छा देखकर मुझे अति प्रसन्नता हुई और मैं भूल ही गई कि मैं स्वस्थ नहीं हूंँ।मुझे जो भी मिला ,उसने पूछा, आप ठीक नहीं थे तो आप रहने देते। पर मुझे लग रहा था कि मैं उन सबको देखकर स्वस्थ हो गई हूँ। उन सबकी मुस्कुराहट से मेरे चेहरे पर भी मुस्कुराहट आ गई थी।खाने-पीने की वस्तुएं तो एक बहाना ही थी। चाय पिलाना या कुछ भी थोड़ा सा किसी के लिए खाने के लिए साथ में लेकर जाना यह इतना महत्वपूर्ण नहीं लग रहा था  जितना मुझे आज यह एहसास हुआ कि जितनी दुआएं सबके लबों से मुझे मिली वह मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण थी। इसीलिए कहते हैं कि कभी-कभी बिना योजना बनाये ही कुछ कार्य करना चाहिए और जो खुशी आपको उससे मिलती है, वह योजना बनाकर किए गए कार्य से भी नहीं मिल पाती है। वहाँ पर बहुत से ऐसे  व्यक्तित्व के लोग मिले  जिनसे हमें प्रेरणा मिलती है। जिनको देखकर सकारात्मक  ऊर्जा पैदा होती है। मैं सोचती हूँ कि किसी एक के जाने ना जाने से कभी कोई कार्य रुक नहीं जाता है और मेरे ना जाने से कोई कार्य रुकता नहीं। पर यह हमारे मन की इच्छा पर निर्भर है। हमें अपने मन को समझाना है कि अगर किसी प्रोग्राम में हमारा सहयोग अनिवार्य हो तो हमें आगे बढ़-चढ़कर कार्य करना चाहिए। हमें उसके लिए अपने मन को प्रेरित करना होगा। आज चाहे तन अस्वस्थ हो। पर मन को अस्वस्थ नहीं होने देना चाहिए। आज जब मैं वहाँ पर पहुँच गई तो मुझे बहुत सुकून मिला और मुझे बहुत प्यारी-प्यारी छात्राओं से भी मिलने का भी मौका मिला ।कहते हैं कि जहाँ आपको जाना होता है ।वहां पर वह वक्त ,वह राहें आपको वहाँ पर ले ही जाती है और तब चाहे आपकी योजना बनी हो चाहे योजना ना बनी हो।  आज मुझे दशमेश ऑडिटोरियम में जाकर बहुत अच्छा लगा ।गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी में काफी समय बाद जाने का मौका मिला। जहाँ पर कल 27/6/26 को ब्राइट पंजाब -2026 प्रोग्राम का आयोजन शिक्षा विभाग की तरफ से किया जा रहा है ।उसकी प्रबंधन योजना का हिस्सा बनने का सौभाग्य मिला ।मुझे पता है कि  वहाँ पर जाकर मैंने कोई भी अधिक जिम्मेदारी का काम नहीं किया है पर फिर भी मुझे लगता है कि वहाँ पर मैं किसी बंदिश के लिए नहीं ,अपनी ड्यूटी समझते हुए गई। करीब 4:30 बजे मैं वहाँ से वापस आ गई थी, पर अभी भी वहाँ पर कल के प्रोग्राम की तैयारी चल रही है। बस यही सोच रही हूँ कि अगर सब अपना-अपना कार्य समय पर करना आरंभ कर दें तो कभी भी किसी कार्य को सफल होने में किसी भी मुश्किल का सामना नहीं करना पड़ेगा।सच कहूँ वहाँ जाकर मुझे खुद को जो सुकून मिला उसे मैं शब्दों में ब्यां नहीं कर सकती। क्रमशः 

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