मेरी तन्हाई-- समय (भाग-29)डॉ.पूर्णिमा राय,पंजाब

मेरी तन्हाई-- समय (भाग-29)
डॉ.पूर्णिमा राय,पंजाब

हे ईश्वर !हमारे साथ ही ऐसा क्यों होता है? हमने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है? हम पर ही मुसीबत के पहाड़ क्यों टूट पड़ते हैं? बार-बार तुम हमारे ही घर पर गमों को दस्तक देने के लिए भेज देते हो ?आखिर ऐसा क्यों होता है? हम भी तो तेरे ही बनाए हुए इंसान है? हमारी भी रगों में  अन्य लोगों जैसा ही खून है ?हमने ऐसे कौन से पाप किए हैं ,जिनकी सजा तुम हमें दे रहे हो! एक मुसीबत खत्म नहीं होती ,दूसरी मुसीबत आ जाती है। इन सवालों के कटघरे में हम अपने मन के साथ-साथ अपने भगवान को भी जिस पर हमें विश्वास है, उस ईश्वर को भी कटघरे में खड़ा कर देते हैं। सवालों की जड़ी लगा देते हैं। पर हम शांत मन से सहजावस्था में चाहकर भी उस मुसीबत के दौर से  गुजर नहीं पाते हैं। वह समय बिताये नहीं बीतता है ।हर पल दु:खद एहसास होता रहता है ।यह सब हमारी मानसिक अवस्था एवं भावनात्मक स्तर पर निर्भर करता है ।जब हम दुनिया में इधर-उधर झांकते हैं,अपने स्व: के दुख से इतर इधर-उधर देखते हैं तो हमें आए दिन कोई ना कोई ऐसी दुर्घटना नजर आ जाती है, जिसके साथ साधारणीकरण होने पर हमें एहसास होने लगता है कि हमारा दुःख  एवं हमारी पीड़ा इससे बहुत अधिक कम थी। मैं मानती हूँ किसी के चले जाने के गम को भुला पाना बहुत मुश्किल होता है। पर कहते हैं इस दुनिया में मुश्किल कुछ भी नहीं है। हर मुश्किल कार्य को आसान किया जा सकता है। इसके लिए आवश्यकता है- हमें अपने खाली समय को व्यस्त रखने का। खाली समय को हमने कैसे बिताना है ,खाली समय में हमने कौन सी बातों को याद करना है?इस पर विचार करना आवश्यक है। अपने व्यस्त समय में को  हम अपने  दिनचर्या के कार्यों में बिताकर निकाल देते हैं, पर जब कभी खाली समय मिलता है तो हम वह बातें याद करने लग जाते हैं जिनसे हमें दुःख होता है। आपका कोई कसूर नहीं है ।यह मानवीय फितरत है। इंसान का भावनात्मक स्तर पर जुड़ाव है, पर हमें उस वक्त अपने मन को स्वत: ही संभल देना है, आसरा देना है और वह बातें याद करने की कोशिश करनी है जिन पलों में हमें उस व्यक्ति से ,उस वस्तु से कुछ हिम्मत मिली थी ।कुछ खुशी के पल मिले थे और उन खुशी के पलों के साथ हमें आगे जीवन में बढ़ना है। उन पलों में कोई हमें कुछ वक्त के लिए सहारा दे सकता है, हमारे मन को ढाढस बंधा सकता है ।बाद का समय हमें स्वत: ही बिताना होता है। उस वक्त हमें हर हाल में अपने मन को समझाना होगा। जब तक स्वत: हम अपने मन को समझा नहीं पाएंगे ,तब तक हमारी मुश्किल वैसे की वैसी ही बनी रहती है। अगर हम ऐसी सोच किसी के कहने से नहीं बल्कि स्वयं अपने आप से ही बना लेंगें तो मुझे लगता है कि जिंदगी जीना आसान हो जाएगा। मैं यह विचार क्यों लिख रही हूँ। किस लिए लिख रही हूँ। क्योंकि मैंने यह अनुभव किया है। समय के साथ ,बदलाव के साथ आपके अंदर प्रौढ़ता आती है। आपके अंदर एक ठहराव आ जाता है। आपको चीजों की समझ आनी शुरू हो जाती है। कुछ लोग ऐसे होते हैं जो जीवन भर बदलना नहीं चाहते हैं। उनको यह समझना होगा कि समय बदल गया ।हमें अपने भीतर उस बदलाव को महसूस करना होगा।हमारी जिन बातों से किसी को नुकसान होता है, जिससे हमारे स्वयं के स्वास्थ्य पर असर पड़ता है ,हमें उन बातों को बदलना होगा। किसी को बदलने की अपेक्षा हमें स्वयं में बदलाव करना होगा। ऐसी सोच अपनी युवावस्था से ही बनाना आरंभ कर दें ।सकारात्मक रहना शुरू कर दें ।अच्छे-अच्छे विचारों को एक दूसरे के साथ बाँटना शुरू कर दें ।अगर किसी के पास प्यार है तो वह प्यार का ही प्रसार करता है। अगर किसी के पास विश्वास है तो विश्वास की ही बातें आगे बढ़ाएगा। जो हम किसी को देते हैं वही हमें दोगुना होकर वापस मिलता है। यह एक सच्चाई है। अगर हम किसी के लिए बुरी बातें सोचते हैं, किसी के लिए गड्ढा खोदते हैं तो हमारे लिए भी वही हो जाता है।कोई स्वर्ग या नरक नहीं है। इस जिंदगी में ही स्वर्ग और नरक है ।फिर हम कहते हैं- मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ ?पर कभी हमने बैठकर ऐसा नहीं सोचा कि शायद अनजाने में मेरे से कोई गलती हो गई हो, जिसकी सजा मुझे भगवान इस रूप में दे रहा है ।बस सदैव ईश्वर से सदैव अपने मन से यही विचार रखें ,यही प्रार्थना करें कि मेरे से कभी किसी का बुरा ना हो जाए। जितना हो सकता है मैं अपने जीवन में अच्छे कार्य कर पाऊँ। किसी की बुराई करतें हैं, किसी की चुगली करते हैं तो कहा जाता है कि हम उसके पाप धो रहे हैं ।इस बात से हम अनभिज्ञ नहीं है। फिर भी हम बार-बार लोगों की चुगली ,निंदा ही करते रहते हैं। फिर हमारा किसी सत्संग में जाने का क्या फायदा !ऑनलाइन मीडिया में भी आपको चारों तरफ अधिकतर नकारात्मकता का प्रसार नजर आता है ।मैं मानती हूँ नकारात्मक होगा तो ही उसमें से सकारात्मकता का संचार आरंभ होगा ।पर इसके लिए जरूरी है कि हम अगर कोई नकारात्मक पोस्ट/ प्रश्न हमें नजर आता है, हम उसका हल ढूंढने का प्रयास करें। अगर हम जितना नकारात्मक सोचते जाएंगे ,उतना ही हम अपनी भीतरी ऊर्जा को कम करते जाएंगे ।इंसान वही सफल माना जाता है जो स्वत: के अच्छे कर्मों से आगे बढ़े। दूसरों की कमियों का बखान करके आगे बढ़ना धूर्तता है, इंसानियत नहीं ।इसलिए अगर आप किसी मंजिल पर पहुँचना चाहते हैं तो आपको सुयोग्य कर्मों से आगे बढ़ना चाहिए ।समय लगेगा पर जब मंजिल मिलेगी तो उसका आनंद कुछ अलग ही होगा । क्रमशः

Comments

Popular posts from this blog

ਜ਼ਿਲ੍ਹਾ ਅੰਮ੍ਰਿਤਸਰ ਵਿਖੇ ਸਿੱਖਿਆ ਦਾ ਮਹਾਂ ਜਸ਼ਨ ---ਮੇਗਾ ਪੀਟੀਐਮ ਦਾ ਹੋਇਆ ਆਯੋਜਨ!

जेंडर लेंस के आधार पर चौथी से आठवीं की पुस्तकों की समीक्षा हेतु तीन दिवसीय वर्कशॉप सफलतापूर्वक हुई संपन्न !

मेरी तन्हाई --खालीपन (भाग-1)