आकलन( लघुकथा)
आकलन( लघुकथा)
कुछ पल के लिए आँखें मूंदे हुए स्निग्धा शांत मन से बैठी हुई थी। अपने मन में उठते हुए सवालों एवं जिम्मेदारियों का आकलन कर रही थी। अचानक फोन की घंटी बजती है। हेलो मैडम, मैं श्रेया बोल रही हूँ। क्या आप मुझे समझा देंगे कि यह कार्य कैसे करना है। श्रेया का यह सवाल सुनते ही स्निग्धा उत्तेजित होकर कहती है कि कितनी बार आपको समझाया है। बार-बार वही बातें दोहराई जा रही हैं। आपको जल्दी समझ क्यों नहीं आता है? मुझे तो लगता है कि आप लोग समझना ही नहीं चाहते हैं। स्निग्धा भूल जाती है कि उसका स्वर थोड़ा कर्कश हो गया।कर्कश ध्वनि में सारी बातें सुनकर श्रेया की आँखें भर आती हैं और वह फोन पर ही फूट-फूट कर रोने लगती है। इधर स्निग्धा रोने की आवाज सुनकर थोड़ा घबरा जाती है। स्वयं को दोषी मानती है। अहसास करती है कि उसे धैर्य रखना चाहिए था। ऐसे नहीं बोलना चाहिए था।अभी स्निग्धा सोच ही रही थी कि श्रेया आगे से कहती है कि मैडम सबकी सामर्थ्य व योग्यता एक जैसी नहीं होती है।बार-बार समझाने के बावजूद भी चाह कर भी हम समझ नहीं पा रहे हैं । क्या कार्य हमें पहले करना है और क्या हमें बाद में करना है ।कार्यभार ऑनलाइन और ऑफलाइन अत्यधिक हो चुका है । जब मानसिक स्वास्थ्य पर असर अधिक पड़ने लगता है तो हम समझने की योग्यता रखते हुए भी समझ नहीं पाते हैं। इसलिए हम वहाँ पहुँच करते हैं। जहां हमें लगता है कि कोई हमें सरल भाषा में आसानी से समझा देगा। पर हम यह भूल जाते हैं कि जिससे पूछा जा रहा है ,उस पर हमसे भी अधिक कितना कार्यभार होगा।हम इन बातों को भूलकर मात्र अपनी ही समस्याओं के समाधान के हल ढूंढने के आसान तरीके खोजने लगते हैं । स्निग्धा श्रेया की बातें सुनकर उसे समझाती है कि भावनात्मक स्तर पर आप अपने आप को कमजोर मत समझें।अपनी कुशलताओं को पहचान कर अपनी सामर्थ्य एवं योग्यता का विकास करें । अगर आप में किसी कार्य को करने के तीव्र इच्छा है वही आपकी सच्ची व असली काबिलियत है। आप में वह सामर्थ्य है जो दूसरों को कई बार नज़र नहीं आती है। हम भी स्वत: उससे अनजान होते हैं जिस वजह से हम शीघ्र घबरा जाते हैं और मानसिक बीमार भी होने लगते हैं।
डॉ.पूर्णिमा राय, पंजाब
2/10/26

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