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हर शख्स जिंदगी में

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  पोस्ट संख्या-55 हर शख्स जिंदगी में by Dr.Purnima Rai हर शख्स जिंदगी में कई किरदार  निभाता है। न चाहते हुए भी वह अपनों को आजमाता है।। सुकून की तलाश में हारने के डर से बेखौफ़, सहजता से लक्ष्य की ओर अग्रसर हो जाता है।। मन अधीर न हो संयम रखता है इस कदर कि, मन-मस्तिष्क की भीतरी तह में घूम आता है।। तलाशते हैं पल भर की एक खुशी जमाने में,  गमज़दा जिस्म मुश्किल से ही चैन पाता है।। सुकर्म कर परवाह न कर औरों की साकी, "पूर्णिमा" राही को राह दीया ही दिखाता है।। डॉ.पूर्णिमा राय, पंजाब 

मज़ाक:एक दर्द (लघुकथा)

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मज़ाक : एक दर्द  (लघुकथा) पोस्ट संख्या -54   आज भी वे दिन याद हैं ,जब हम सब एक स्कूल में भर्ती हो गये तो बस वहीं के हो कर रह गये।जिस कक्षा तक स्कूल में पढ़ाई होती थी ,उसी कक्षा तक हम उस स्कूल में पढ़ते थे।नई कक्षा में ही नए स्कूल में दाखिला लेते थे और स्कूल शिक्षा पूरी करके ही स्कूल छोड़ते थे। स्कूल स्कूल नहीं लगता था, बल्कि एक परिवार एवं मंदिर, गुरुद्वारे जैसा लगता था।शायद यही कारण था कि उस जमाने में भी माता-पिता अनपढ़ होते हुए भी शिक्षित सा ही व्यवहार करते थे। चाहे बच्चों की छोटी-छोटी  जिद्द कभी-कभी तो मान लेते थे,लेकिन स्कूल का नया सैशन आरंभ होने के बाद बीच सत्र में बच्चों का कभी भी स्कूल बदलते नहीं थे।वे माता-पिता स्कूल एवं शिक्षकों का महत्व समझते थे । बच्चों का भला-बुरा समझते थे। बच्चों को भी मां -बाप का डर और शिक्षकों, सहपाठियों और अपने स्कूल से लगाव होता था।तभी आठवीं, दसवीं, बारहवीं पास करके ही स्कूल के बाद कालेज यां अन्य व्यवसाय में जिंदगी के बाकी पल बिताते थे।आज हास्यस्पद स्थिति बन गई है।दाखिला बढ़ाने का प्रपंच सबके भीतर घुन की तरह लग गया है।बड़ी मछली छोटी क...

आँखों ने ख्वाब सजाया है

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  पोस्ट संख्या -53 बहारों ने फूल बिछाया है आँखों ने ख्वाब सजाया है नर्म बिछी फूलों की चादर धरती को सीस झुकाया है कण-कण बिखरा दर्द समेटा कुदरत ने प्रेम सिखाया है फूल कली बिन अपूर्ण आंगन मानव मन को समझाया है रिश्तों को न तोलो धन से धन ने दोस्त छुड़वाया है। फूल न तोड़ें, खुशबू बाँटे "पूर्णिमा"जग को बताया है। डॉ.पूर्णिमा राय, पंजाब 

राष्ट्रीय युवा दिवस -स्वामी विवेकानंद जी की जयंती पर हार्दिक बधाई

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  राष्ट्रीय युवा दिवस -स्वामी विवेकानंद जी की जयंती पर हार्दिक बधाई   पोस्ट संख्या-52   युवा शक्ति ही देश का, कर सकती कल्याण । ओज-जोश की अग्नि से,हो मानव उत्थान।। युवा विवेकानंद जी,करें राष्ट्र हित बात। पद्चिह्नों पर हम चलें, नेक बनें ख्यालात ।। डॉ.पूर्णिमा राय पंजाब 

ए दिल मेरे

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ए दिल मेरे  पोस्ट संख्या-51 कोई आये कोई जाये,  ग़म न करना ए दिल मेरे। सपने अधूरे न रहेंगे किसी के,  हो जायेंगे सपने पूरे।। मन की लगन को जिंदा रखना, जिंदादिल ही जिंदगी जीते। कर्मों का फल मिलता यहीं पर, हिम्मती ही विष का घूँट पीते।। कोई आये कोई जाये..... अपनी कमी को जो स्वीकारे , वो ही दुनिया में यश हैं पाते। गुण-अवगुण से ऊपर उठकर , खुद ही अपनी जगह बनाते।। कोई आये कोई जाये.... मन की स्वच्छता है सबसे ऊपर, गोरी देह तो मृगतृष्णा सी। सत्य तो सत्य है अमर रहेगा , मीरां दीवानी बस कृष्णा की।। कोई आये कोई जाये.. ‌ जिस थाली में खाना खाओ,  उस थाली में छेद न करना। जीवन "पूर्णिमा" छोटा सा है  एक दिन हम सबको भी मरना।। कोई आये कोई जाये.... डॉ.पूर्णिमा राय, पंजाब  21/9/23

आँचल (लघुकथा)

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  आँचल (लघुकथा)पोस्ट संख्या-50 स्कूल लगने की घंटी के साथ ही सब छात्र-छात्रायें कतारों में खड़े होकर ईश वंदना करने लगे।राष्ट्र गान जन गण मन की मधुर धुन के बजते ही अदब से सभी  बिना हिलजुल के खड़े हो गये।अब आपके सामने नवम् कक्षा की आँचल आज का विचार पेश करेगी, अध्यापक के संबोधन को सुनकर सब तालियाँ बजाते हुये आँचल के स्टेज पर आने की प्रतीक्षा करने लगे। एक साँवली सी लड़की अपनी मधुर आवाज़ में बोली,परिवार !! और साथ ही रो पड़ी!!सभी हतप्रभ से  आँचल को निहारने लगे ।ये लड़की तो सदैव हँसती खिलखिलाती नजर आती थी,हरेक कार्य में निपुण ,आज आँसुओं भरी आँखों से बस एक ही शब्द परिवार कहकर चुप क्यों हो गई।सुबकती आँचल ने आँचल से भीगी आँखें पोंछते कहा,मेरा परिवार बिखर गया।मेरे दादा जी ने पापा को घर से निकाल दिया ।दादा जी के बार-बार समझाने पर भी पापा ने मम्मी को सबके सामने मारना,गाली गलौच करना बंद न किया था।और शराब पीने से परहेज न किया।अचानक प्रिंसीपल ने पीछे से आँचल के कँधे पर हाथ रखकर उसे धैर्य बँधवाते कहा,तुम्हारे दादा जी ने तुम्हारे पिता को सबक सिखाने के लिये ऐसा किया है।तुम घबराओ मत! स्कूल एक मंदिर...

पोस्ट संख्या-49 हिंदी दिवस पर विशेष सृजन: डॉ.पूर्णिमा राय(2015-2023)

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  हिंदी दिवस पर विशेष सृजन: डॉ.पूर्णिमा राय(2015-2023) 1*ग़ज़ल  (2015) बनाकर भावों की बाती चलो दीपक जलाते हैं।                               धरा पर पेड़ हिंदी  के चलो मिलकर लगाते हैं। मिटा कर झगड़े भाषा के नयी दुनिया बनायें हम।                        सजा कर प्रीत की बोली चलो खुशियां मनाते हैं।। दिखाकर प्रेम हिंदी से बढ़ायें मान भारत का                                  सुना कर गीत हिंदी के चलो सत्कार पाते हैं।। मिला जब संग हिंदी का खिले गुलशन बहारों का.                            बहा कर ज्ञान की धारा चलो जन्नत बसाते हैं।। सदा गुण ही तलाशे हैं छिपाकर ऐब औरों के                                  लुटा कर "प...