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कुदरत (कविता

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  कुदरत (कविता) पोस्ट संख्या -58 बारिश की बूंदें भी  शोर कर रहीं  उथल-पुथल हो रही है कुदरत में या इस बेजान दिल में ! हवाओं ने राहत दी तो है थोड़ी  कमबख़्त अपनों ने रुलाने की जिद्द  न छोड़ी अब तक!! हल्की टहनियाँ   संभाल न पा रही वज़न अपना जो लिपटी चिपकी हुई हैं अपने  पौधे से वे मन्द-मन्द मुस्कुरा रही हैं  मस्ती में !! चाहे तन भीग रहे हैं अकस्मात्  बारिश में मगर गर्मी में वर्षा की आमद कह रही है कि मन की शीतलता से ही  बचेगा संसार !! डॉ.पूर्णिमा राय, पंजाब 

मोहरा (कविता)

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  मोहरा (कविता ) पोस्ट संख्या -57 मेरी उड़ान सीमित  नहीं है मेरे तक मेरा सुकून भी  सिर्फ मेरा नहीं  मेरी जद्दोजहद भी मेरी नहीं  न चाहत हैं कुछ पाने की न खोने का डर अब बस एक भ्रम था कि मैं हक से कुछ कह पाऊँ आँख खुली तो  वह भी टूट गया  जो गहरा था भीतर प्याला  पलकों के कोरों से बह गया  आज फिर झूठा अपनापन एक बार फिर मन को खालीपन से भर गया अब चुप रहना है मुश्किल  इक मोहरा बनना है मुश्किल!! डॉ.पूर्णिमा राय, पंजाब 

बसंत ऋतु का आगमन

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पोस्ट सँख्या-56  बसंत ऋतु!!(दोहे) वर दे वीणा वादिनी, सुखी बसे संसार! बसंत ऋतु का आगमन,घर-घर में हो प्यार!! ऋतु बसंत की कह रही,करो वैर को दूर। प्रेम हवाएं बह रही, दिखता मुख पर नूर। जीवन में खुशियाँ मिलें,आये जब मधुमास। मुख पर बिखरेगी हँसी,करें हास- परिहास।। शोभा सोहे बाग़ की,छिप जाती फिर धूल। खिल जाते जब बाग़ में,रंग-बिरंगे फूल।। चित्त भी पावन हो गया,आस जगी हर ओर। फूल-फूल पर ओस है,नाचे मनवा मोर।। डॉ.पूर्णिमा राय, पंजाब  2/2/25

हर शख्स जिंदगी में

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  पोस्ट संख्या-55 हर शख्स जिंदगी में by Dr.Purnima Rai हर शख्स जिंदगी में कई किरदार  निभाता है। न चाहते हुए भी वह अपनों को आजमाता है।। सुकून की तलाश में हारने के डर से बेखौफ़, सहजता से लक्ष्य की ओर अग्रसर हो जाता है।। मन अधीर न हो संयम रखता है इस कदर कि, मन-मस्तिष्क की भीतरी तह में घूम आता है।। तलाशते हैं पल भर की एक खुशी जमाने में,  गमज़दा जिस्म मुश्किल से ही चैन पाता है।। सुकर्म कर परवाह न कर औरों की साकी, "पूर्णिमा" राही को राह दीया ही दिखाता है।। डॉ.पूर्णिमा राय, पंजाब 

मज़ाक:एक दर्द (लघुकथा)

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मज़ाक : एक दर्द  (लघुकथा) पोस्ट संख्या -54   आज भी वे दिन याद हैं ,जब हम सब एक स्कूल में भर्ती हो गये तो बस वहीं के हो कर रह गये।जिस कक्षा तक स्कूल में पढ़ाई होती थी ,उसी कक्षा तक हम उस स्कूल में पढ़ते थे।नई कक्षा में ही नए स्कूल में दाखिला लेते थे और स्कूल शिक्षा पूरी करके ही स्कूल छोड़ते थे। स्कूल स्कूल नहीं लगता था, बल्कि एक परिवार एवं मंदिर, गुरुद्वारे जैसा लगता था।शायद यही कारण था कि उस जमाने में भी माता-पिता अनपढ़ होते हुए भी शिक्षित सा ही व्यवहार करते थे। चाहे बच्चों की छोटी-छोटी  जिद्द कभी-कभी तो मान लेते थे,लेकिन स्कूल का नया सैशन आरंभ होने के बाद बीच सत्र में बच्चों का कभी भी स्कूल बदलते नहीं थे।वे माता-पिता स्कूल एवं शिक्षकों का महत्व समझते थे । बच्चों का भला-बुरा समझते थे। बच्चों को भी मां -बाप का डर और शिक्षकों, सहपाठियों और अपने स्कूल से लगाव होता था।तभी आठवीं, दसवीं, बारहवीं पास करके ही स्कूल के बाद कालेज यां अन्य व्यवसाय में जिंदगी के बाकी पल बिताते थे।आज हास्यस्पद स्थिति बन गई है।दाखिला बढ़ाने का प्रपंच सबके भीतर घुन की तरह लग गया है।बड़ी मछली छोटी क...

आँखों ने ख्वाब सजाया है

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  पोस्ट संख्या -53 बहारों ने फूल बिछाया है आँखों ने ख्वाब सजाया है नर्म बिछी फूलों की चादर धरती को सीस झुकाया है कण-कण बिखरा दर्द समेटा कुदरत ने प्रेम सिखाया है फूल कली बिन अपूर्ण आंगन मानव मन को समझाया है रिश्तों को न तोलो धन से धन ने दोस्त छुड़वाया है। फूल न तोड़ें, खुशबू बाँटे "पूर्णिमा"जग को बताया है। डॉ.पूर्णिमा राय, पंजाब 

राष्ट्रीय युवा दिवस -स्वामी विवेकानंद जी की जयंती पर हार्दिक बधाई

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  राष्ट्रीय युवा दिवस -स्वामी विवेकानंद जी की जयंती पर हार्दिक बधाई   पोस्ट संख्या-52   युवा शक्ति ही देश का, कर सकती कल्याण । ओज-जोश की अग्नि से,हो मानव उत्थान।। युवा विवेकानंद जी,करें राष्ट्र हित बात। पद्चिह्नों पर हम चलें, नेक बनें ख्यालात ।। डॉ.पूर्णिमा राय पंजाब