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पोस्ट संख्या- 45 बेवजह हम कहीं आते-जाते नहीं।

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  गज़ल- 45 पोस्ट संख्या- 45 बेवजह हम कहीं आते-जाते नहीं। बात बेकार की हम सुनाते नहीं।। डूबते को बचायें चलो मिलके सब; गैऱ को तो कभी हम बुलाते नहीं।। आसरा ढूँढते सच्चे दिल का सभी; दो कदम फासला क्यों घटाते नहीं।। लोग देखें तमाशा बड़े शौंक से; जख्म पर क्यों ये' मरहम लगाते नहीं।। सिन्धु जल से पुकारे मुझे हाथ दो ; नाव अटकी भँवर में बचाते नहीं।। मौत के इन पलों में तुम्हीं साथ हो; सात जन्मों की यूँ कसमें खाते नहीं।। ढल गया है दिवस सांझ ताउम्र की; "पूर्णिमा" को गगन में सजाते नहीं।। ...डॉ.पूर्णिमा राय अमृतसर(पंजाब)

पोस्ट संख्या- 44बहुत हो चुकी दिल्लगी ये तुम्हारी तुम्हीं को हमेशा मनाते रहें हम।

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 गज़ल- 44 पोस्ट संख्या- 44 बहुत हो चुकी दिल्लगी ये तुम्हारी तुम्हीं को हमेशा मनाते रहें हम ब ड़ी देर कर दी सनम आते' आते तुम्हीं से ये' नजरें मिलाते रहें हम।। बिना बात के रूठ जाना तुम्हारा कभी खुद को हमसे छिपाना तुम्हारा; अदायें वफायें जफाओं के किस्से हवाओं को ही बस सुनाते रहें हम।। धड़कने लगी आज धड़कन हमारी गरजते हैं मेघा ज्यों घन घन गगन में; खिलेंगी बहारें जवाँ हैं उमंगे नशा प्रीत का ही चढ़ाते रहें हम।। हसीं रात तारों भरी संग चन्दा तुम्हीं को निहारे तुम्हीं को पुकारे मुहब्बत तुम्हीं हो इबादत तुम्हीं हो इनायत तुम्हारी ही' गाते रहें हम।। करे "पूर्णिमा" प्रार्थना आज भगवन दिलों का ये रिश्ता कभी भी न टूटे; भुलाकर गिले और शिकवे तुम्हारे मुहब्बत से' नफरत मिटाते रहें हम।। डॉ.पूर्णिमा राय, पंजाब

पोस्ट संख्या- 43अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए।

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  गज़ल- 43 पोस्ट संख्या- 43 अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए। रक्त की बूँद को भी गिरने से बचाया जाए।। बैर की आग में बस झुलसी हुई दिखती दुनिया; प्यार के नूर से ही कुदरत को सजाया जाए।।  सरसराहट सुनी पत्तों की तो डर जाए मनुज; ख़ौफ के कहर से अब हर दिल को बचाया जाए।। करवटें लेकर ही बीती औ'बीतेंगी रातें; रूह को प्रेम की बगिया में भी घुमाया जाए।। मैं बुरा,मन यह बुरा हर पल ही ढूँढे है बुरा; आईना " पूर्णिमा " में खुद को भी दिखाया जाए।। डॉ.पूर्णिमा राय,अमृतसर। 6/2/17

पोस्ट संख्या- 42उड़ती है मुख की रंगत नफरत के रास्ते।

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  गज़ल- 42 पोस्ट संख्या- 42 उड़ती है मुख की रंगत नफरत के रास्ते। मिलती सिर्फ मुहब्बत इबादत के रास्ते।। आँखों में बस गये थे पहली नज़र में जो, उतरे वो दिल में देखो शराफत के रास्ते।। भोली अदायें रूख पे गिरा एक नकाब है, नाज़ुक जवानी ढूँढे शरारत के रास्ते।। कैसा ये दौर आया हुये बेवफा सनम, गैरों से कब मिलेंगे हिफाजत के रास्ते।। चुपचाप मन ने तुमको किया था कबूल जब, मिलने लगी थी रूहें नज़ाकत के रास्ते।। दूरी बढ़ी दिलों में खत्म हो गया जहाँ, खुलने लगे हैं खुद ही अदावत के रास्ते।। नव "पूर्णिमा" गगन को रोशन न कर सकी, धरती भी चल पड़ी अब बगावत के रास्ते।। डॉ.पूर्णिमा राय,अमृतसर 20/9/17

पोस्ट संख्या- 41भक्ति भावों से दुनिया का उद्धार हो।

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  गज़ल- 41 पोस्ट संख्या- 41 भक्ति भावों से दुनिया का उद्धार हो। सत्य राहों से सजता ये संसार हो।। बीज बीजें सदा हम ये इन्सानियत; प्रेम उपजा खिला तब ही व्यवहार हो।। चैन की बांसुरी ये है बजती तभी।; मन से होता अगर दूर तकरार हो।। सात रंगों की चाहत हैं रखते सभी; "पूर्णिमा" से ही आलम ये गुलजार हो।। डॉ.पूर्णिमा राय, पंजाब

पोस्ट संख्या- 40हँसमुख चेहरा,रूप नूरानी,प्यार भरी तेरी मुस्कानों का।

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  गज़ल- 40 पोस्ट संख्या- 40 हँसमुख चेहरा,रूप नूरानी,प्यार भरी तेरी मुस्कानों का। कर्ज चुकाया जा नहीं सकता,गुरुदेव तेरे एहसानों का।।  बिन तेरे अब मेरे सत्गुरु ,मेरे इस जीवन का मोल नहीं; बिना रूह के प्राण अधूरे,तुम संग सजे मन अरमानों का। रोम-रोम पुलकित हर जन का.प्रेम स्नेह की धन- दौलत बख्शी;  नहीं जगत में कोई अपना ,बिन तेरे हम जैसे बेगानों का।। माटी की काया थी हमरी ,कंचन पारस तुम थे सत्गुरु; भवसागर से पार उतारा,अनजान सफर हम अनजानों का  शरण "पूर्णिमा" सत्गुरु तेरी,अपने बचपन में ही आई है; अपार अनंत असीम कृपा और आँगन सजा वरदानों का । डॉ.पूर्णिमा राय,अमृतसर(पंजाब),20/11/16

पोस्ट संख्या- 39प्रेम को है समर्पित विधा गीतिका।

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  गज़ल- 39 पोस्ट संख्या- 39 प्रेम को है समर्पित विधा गीतिका। ओज भावों से' गर्वित विधा गीतिका।। हास परिहास दिखता यहाँ भाव में ; करती' मन को तरंगित विधा गीतिका।। जोश से है चलें लेखकों की कलम; कर रही भाव प्रेषित विधा गीतिका।। हाल जग का दिखे लेखनी जब चले; व्योम करती समाहित विधा गीतिका।। धूप छाया सुहावन लगे मनचली; सूर्य किरणों में लक्षित विधा गीतिका।। धैर्य से मंजिलों को सदा सर करें; काव्य राहों में वंदित विधा गीतिका।। नीर अखियों से बहता दिखे गर कभी; प्रेम बाँटे असीमित विधा गीतिका।। आज हँसने को बेताब मन ये बहुत; हो रही आज हर्षित विधा गीतिका।। आसमाँ में दिखे "पूर्णिमा "की तरह; ये रहेगी प्रकाशित विधा गीतिका।। छू रही तेज कदमों से' अब ये गगन; "पूर्णिमा" ज्ञान अर्जित विधा गीतिका।। डॉ.पूर्णिमा राय,अमृतसर